उठो, धरा के अमर सपूतों – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो। जन-जन के जीवन में फिर से नव स्फूर्ति, नव प्राण भरो।

हम ऐसे आज़ाद हमारा झंडा है बादल – हरिवंशराय बच्चन

हम ऐसे आज़ाद हमारा झंडा है बादल। चाँदी सोने हीरे मोती से सजती गुड़ियाँ। इनसे आतंकित करने की बीत गई घड़ियाँ इनसे सज धज बैठा करते जो हैं कठपुतले हमने तोड़ अभी फेंकी हैं बेड़ी हथकड़ियाँ

लकड़ी की काठी – गुलज़ार

लकड़ी की काठी, काठी पे घोड़ा घोड़े की दुम पे जो मारा हथौड़ा दौड़ा दौड़ा दौड़ा घोड़ा दुम उठा के दौड़ा

हम को मन की शक्ति देना – गुलज़ार

हम को मन की शक्ति देना, मन विजय करें दूसरो की जय से पहले, ख़ुद को जय करें।

जिहि फन फुत्कार उड़त पहाड़ भार – भूषण

जिहि फन फुत्कार उड़त पहाड़ भार,            कूरम कठिन जनु कमल बिदगिलो.

झाँसी की रानी – सुभद्रा कुमारी चौहान

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी, गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी। चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

गरुड़ को दावा – भूषण

गरुड़ को दावा जैसे नाग के समूह पर दावा नाग जूह पर सिंह सिरताज को

चमकीले तारे – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

क्या चमकीले तारे हैं, बड़े अनूठे, प्यारे हैं! आँखों में बस जाते हैं, जी को बहुत लुभाते हैं! जगमग-जगमग करते हैं,

पद्मिनी गोरा बादल – नरेंद्र मिश्र

पद्मिनी गोरा बादल नरेंद्र मिश्रा द्वारा हिंदी में एक अद्भुत कविता है यह राजपूत योद्धाओं गोरा और बादल की बहादुरी का वर्णन करता है जिन्होंने चित्तोड़ के राजा रावल रतन सिंह को बचाते हैं जिन्हें अलाउद्दीन खिलजी ने बंदी बना लिया था।

छत्रसाल : प्रशस्ति – भूषण

कवि भूषण ने महाराज छत्रसाल की प्रशंसा में ‘छत्रसाल दशक’ की रचना की थी । यह कविता उसी का अंश है । इन पंक्तियों में युद्धरत छत्रसाल की तलवार और बरछी के पराक्रम का वर्णन किया है ।