उनकी ख़ैरो-ख़बर नहीं मिलती हमको ही ख़ासकर नहीं मिलती शायरी को नज़र नहीं मिलती मुझको तू ही अगर नहीं मिलती
Category: हिंदी कविताएँ
बजी कहीं शहनाई सारी रात – रमानाथ अवस्थी
सो न सका कल याद तुम्हारी आई सारी रात और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात मेरे बहुत चाहने पर भी नींद न मुझ तक आई ज़हर भरी जादूगरनी-सी मुझको लगी जुन्हाई मेरा मस्तक सहला कर बोली मुझसे पुरवाई दूर कहीं दो आँखें भर-भर आई सारी रात और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात
आदर्श प्रेम – हरिवंशराय बच्चन
प्यार किसी को करना लेकिन कह कर उसे बताना क्या अपने को अर्पण करना पर और को अपनाना क्या गुण का ग्राहक बनना लेकिन गा कर उसे सुनाना क्या मन के कल्पित भावों से औरों को भ्रम में लाना क्या
आज फिर से – हरिवंशराय बच्चन
आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ । है कंहा वह आग जो मुझको जलाए, है कंहा वह ज्वाल पास मेरे आए, रागिनी, तुम आज दीपक राग गाओ; आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।
कुछ छोटे सपनो के बदले – कुमार विश्वास
कुछ छोटे सपनो के बदले, बड़ी नींद का सौदा करने, निकल पडे हैं पांव अभागे,जाने कौन डगर ठहरेंगे ! वही प्यास के अनगढ़ मोती, वही धूप की सुर्ख कहानी, वही आंख में घुटकर मरती, आंसू की खुद्दार जवानी, हर मोहरे की मूक विवशता,चौसर के खाने क्या जाने हार जीत तय करती है वे, आज कौन से घर ठहरेंगे निकल पडे हैं पांव अभागे,जाने कौन डगर ठहरेंगे ! कुछ पलकों में बंद चांदनी,
प्रतीक्षा – हरिवंशराय बच्चन
मधुर प्रतीक्षा ही जब इतनी प्रिय तुम आते तब क्या होता? मौन रात इस भान्ति कि जैसे, कोइ गत वीणा पर बज कर अभी अभी सोयी खोयी सी, सपनो में तारों पर सिर धर और दिशाओं से प्रतिध्वनियां जाग्रत सुधियों सी आती हैं कान तुम्हारी तान कहीं से यदि सुन पाते, तब क्या होता?
साजन आए, सावन आया – हरिवंशराय बच्चन
अब दिन बदले, घड़ियाँ बदलीं, साजन आए, सावन आया। धरती की जलती साँसों ने मेरी साँसों में ताप भरा, सरसी की छाती दरकी तो कर घाव गई मुझपर गहरा,
राष्ट्रिय ध्वज – हरिवंशराय बच्चन
नागाधिराज श्रृंग पर खडी हुई, समुद्र की तरंग पर अडी हुई, स्वदेश में जगह-जगह गडी हुई, अटल ध्वजा हरी,सफेद केसरी!
पतझड़ की शाम – हरिवंशराय बच्चन
है यह पतझड़ की शाम, सखे ! नीलम-से पल्लव टूट गए, मरकत-से साथी छूट गए, अटके फिर भी दो पीत पात जीवन-डाली को थाम, सखे ! है यह पतझड़ की शाम, सखे !
पहचान में तेरे प्रिये – बिकाश पाण्डेय
तुम सदा वे ही रहे जो पास मेरे ना रहा, कभी यादों की हुक तो, कभी अनछुआ सपना रहा | कैसे कहूं की विह्वल हूँ आज फिर किस के लिए ? ये जन्म भी कट जाएगा पहचान में तेरे प्रिये..





