जिंदगी – विकास कुमार

वक्त के पायदानों पर दुपाये खड़ी है जिंदगी रेत के मानिंद हथेली से फिसलती जिंदगी जागकर नहाई धोई और चल पड़ी है जिंदगी उबड़ खाबड़ रास्ते औऱ सड़कों पर दौड़ती जिंदगी

चिडिया और चुरूंगुन – हरिवंशराय बच्चन

छोड़ घोंसला बाहर आया, देखी डालें, देखे पात, और सुनी जो पत्‍ते हिलमिल, करते हैं आपस में बात;- माँ, क्‍या मुझको उड़ना आया? 'नहीं, चुरूगुन, तू भरमाया'

हम बे-शहर बे-सहर ही सही – विकाश कुमार

हम बे-शहर बे-सहर ही सही, ज़िंदगी हमारी दोपहर ही सही दिल में वफ़ा का गुमान तो है, वैसे सफ़र बे-हमसफ़र ही सही

लहर सागर का नहीं श्रृंगार – हरिवंशराय बच्चन

लहर सागर का नहीं श्रृंगार, उसकी विकलता है; अनिल अम्बर का नहीं खिलवार उसकी विकलता है; विविध रूपों में हुआ साकार, रंगो में सुरंजित, मृत्तिका का यह नहीं संसार, उसकी विकलता है।

गीत मेरे – हरिवंशराय बच्चन

गीत मेरे, देहरी का दीप-सा बन। एक दुनिया है हृदय में, मानता हूँ, वह घिरी तम से, इसे भी जानता हूँ, छा रहा है किंतु बाहर भी तिमिर-घन, गीत मेरे, देहरी का द‍ीप-सा बन।

कुछ बातें हैं… – विकाश कुमार

कुछ बातें हैं तुम कहो तो बता दूँ ‬ सब अच्छा कुछ बुरा भी जता दूँ बड़ी शिद्दत से पहुँचा हूँ मंज़िल पर कुछ याद आए तो घर का पता दूँ

साथी, साँझ लगी अब होने! – हरिवंशराय बच्चन

फैलाया था जिन्हें गगन में, विस्तृत वसुधा के कण-कण में, उन किरणों के अस्ताचल पर पहुँच लगा है सूर्य सँजोने! साथी, साँझ लगी अब होने!

मेघदूत के प्रति – हरिवंशराय बच्चन

"मेघ" जिस जिस काल पढ़ता, मैं स्वयं बन मेघ जाता! हो धरणि चाहे शरद की चाँदनी में स्नान करती, वायु ऋतु हेमंत की चाहे गगन में हो विचरती,

औरत हुँ मैं – प्रिया आर्य “दीवानी’

नदी की गहराई में छुपी मिट्टी हुँ मैं जिस साँचे में डालो, ढल जाती हुँ मैं…..   आँशुयो की बेमौसम बरसात हुँ मैं दिल का दर्द सहने में पत्थर हुँ मैं…..

रात आधी, खींच कर मेरी हथेली – हरिवंशराय बच्चन

रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।  फ़ासला था कुछ हमारे बिस्तरों में और चारों ओर दुनिया सो रही थी, तारिकाएँ ही गगन की जानती हैं जो दशा दिल की तुम्हारे हो रही थी, मैं तुम्हारे पास होकर दूर तुमसे