जो बहुत बनते हैं उनके पास से, चाह होती है कि कैसे टलें। जो मिलें जी खोलकर उनके यहाँ चाहता है कि सर के बल चलें॥ और की खोट देखती बेला, टकटकी लोग बाँध लेते हैं। पर कसर देखते समय अपनी, बेतरह आँख मूँद लेते हैं॥
Category: हिंदी कविताएँ
दमदार दावे – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
जो आँख हमारी ठीक ठीक खुल जावे। तो किसे ताब है आँख हमें दिखलावे। है पास हमारे उन फूलों का दोना। है महँक रहा जिनसे जग का हर कोना। है करतब लोहे का लोहापन खोना। हम हैं पारस हो जिसे परसते सोना। जो जोत हमारी अपनी जोत जगावे। तो किसे ताब है आँख हमें दिखलावे
मेरा देश – विकास-कुमार
यह अमर कथा है भारत की सृष्टी के श्रेष्ठ विचारक की विश्व गुरु का ज्ञान जहां है स्वर्ण चिड़िया का बखान यहां है कल कल गंगा यहां बहती है चल चल कर यह कुछ कहती है मस्तक पर गिरिराज विराजे सिंधु स्वम पाँव पखारे उर पर बहती सरिता सुंदर
हमारा पतन – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
जैसा हमने खोया, न कोई खोवेगा ऐसा नहीं कोई कहीं गिरा होवेगा।। एक दिन थे हम भी बल विद्या बुद्धिवाले एक दिन थे हम भी धीर वीर गुनवाले एक दिन थे हम भी आन निभानेवाले एक दिन थे हम भी ममता के मतवाले।। जैसा हम सोए क्या कोई सोवेगा। ऐसा नहीं कोई कहीं गिरा होवेगा।।
माँ – कुमार विश्वास
माँ पालती है पेड़ एक लाड़ से प्यार से दुलार से। माँ सुलाती है लोरी गा पिलाती है दूध लुटाती है तन मन प्राण
सरिता – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
किसे खोजने निकल पड़ी हो। जाती हो तुम कहाँ चली। ढली रंगतों में हो किसकी। तुम्हें छल गया कौन छली।। क्यों दिन–रात अधीर बनी–सी। पड़ी धरा पर रहती हो। दु:सह आतप शीत–वात सब दिनों किस लिये सहती हो।।
संध्या – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
दिवस का अवसान समीप था गगन था कुछ लोहित हो चला तरू–शिखा पर थी अब राजती कमलिनी–कुल–वल्लभ की प्रभा विपिन बीच विहंगम–वृंद का कल–निनाद विवधिर्त था हुआ ध्वनिमयी–विविधा–विहगावली उड़ रही नभ मण्डल मध्य थी
बादल – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
सखी ! बादल थे नभ में छाये बदला था रंग समय का थी प्रकृति भरी करूणा में कर उपचय मेघ निश्चय का।। वे विविध रूप धारण कर नभ–तल में घूम रहे थे गिरि के ऊँचे शिखरों को गौरव से चूम रहे थे।।
कर्मवीर – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
देख कर बाधा विविध, बहु विघ्न घबराते नहीं रह भरोसे भाग्य के दुख भोग पछताते नहीं काम कितना ही कठिन हो किन्तु उकताते नहीं भीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहीं हो गये एक आन में उनके बुरे दिन भी भले सब जगह सब काल में वे ही मिले फूले फले ।
एक नया अनुभव – हरिवंशराय बच्चन
कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था भावना के हाथ ने जिसमें वितानों को तना था। स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर, कंकड़ों को एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है।




