निर्मम संसार – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

वायु के मिस भर भरकर आह । ओस मिस बहा नयन जलधार । इधर रोती रहती है रात । छिन गये मणि मुक्ता का हार ।।१।।

अनुभूति – सुमित्रानंदन पंत

तुम आती हो, नव अंगों का शाश्वत मधु-विभव लुटाती हो। बजते नि:स्वर नूपुर छम-छम, सांसों में थमता स्पंदन-क्रम, तुम आती हो, अंतस्थल में शोभा ज्वाला लिपटाती हो।

मतवाली ममता – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

मानव ममता है मतवाली । अपने ही कर में रखती है सब तालों की ताली । अपनी ही रंगत में रंगकर रखती है मुँह लाली । ऐसे ढंग कहा वह जैसे ढंगों में हैं ढाली । धीरे-धीरे उसने सब लोगों पर आँखें डाली । अपनी-सी सुन्दरता उसने कहीं न देखी-भाली ।

अमर स्पर्श – सुमित्रानंदन पंत

खिल उठा हृदय,  पा स्पर्श तुम्हारा अमृत अभय!  खुल गए साधना के बंधन,  संगीत बना, उर का रोदन,  अब प्रीति द्रवित प्राणों का पण,  सीमाएँ अमिट हुईं सब लय।

फूल – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

रंग कब बिगड़ सका उनका रंग लाते दिखलाते हैं । मस्त हैं सदा बने रहते । उन्हें मुसुकाते पाते हैं ।।१।। भले ही जियें एक ही दिन । पर कहा वे घबराते हैं । फूल हँसते ही रहते हैं । खिला सब उनको पाते हैं ।।२।।

प्रथम रश्मि – सुमित्रानंदन पंत

प्रथम रश्मि का आना रंगिणि! तूने कैसे पहचाना? कहाँ, कहाँ हे बाल-विहंगिनि! पाया तूने वह गाना? सोयी थी तू स्वप्न नीड़ में, पंखों के सुख में छिपकर, ऊँघ रहे थे, घूम द्वार पर, प्रहरी-से जुगनू नाना।

विवशता – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

रहा है दिल मला करे । न होगा आँसू आए । सब दिनों कौन रहा जीता । सभी तो मरते दिखलाए ।।१।। हो रहेगा जो होना है टलेगी घड़ी न घबराए। छूट जाएँगे बंधन से। मौत आती है तो आए।।२।।

प्यासी आँखें – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

कहें क्या बातें आँखों की । चाल चलती हैं मनमानी । सदा पानी में डूबी रह । नहीं रख सकती हैं पानी ।।१।। लगन है रोग या जलन है । किसी को कब यह बतलाया । जल भरा रहता है उनमें । पर उन्हें प्यासी ही पाया ।।२।।

आँसू और आँखें – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

दिल मचलता ही रहता है । सदा बेचैनी रहती है । लाग में आ आकर चाहत । न जाने क्या क्या कहती है ।।१।। कह सके यह कोई कैसे । आग जी की बुझ जाती है । कौन सा रस पाती है जो । आँख आँसू बरसाती है ।।२।।

विबोधन – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

खुले न खोले नयन, कमल फूले, खग बोले; आकुल अलि-कुल उड़े, लता-तरु-पल्लव डोले। रुचिर रंग में रँगी उमगती ऊषा आई; हँसी दिग्वधू, लसी गगन में ललित लुनाई। दूब लहलही हुई पहन मोती की माला; तिमिर तिरोहित हुआ, फैलने लगा उँजाला। मलिन रजनिपति हुए, कलुष रजनी के भागे; रंजित हो अनुराग-राग से रवि अनुरागे। कर सजीवता दान बही नव-जीवन-धारा; बना ज्योतिमय ज्योति-हीन जन-लोचन-तारा। दूर हुआ अवसाद गात गत जड़ता भागी; बहा कार्य का सोत, अवनि की जनता जागी। निज मधुर उक्ति वर विभा से है उर-तिमिर भगा रही; जागो-जागो भारत-सुअन है, जग-जननि जगा रही।