नभ की है उस नीली चुप्पी पर घंटा है एक टंगा सुन्दर, जो घडी घडी मन के भीतर कुछ कहता रहता बज बज कर। परियों के बच्चों से प्रियतर, फैला कोमल ध्वनियों के पर कानों के भीतर उतर उतर
Category: हिंदी कविताएँ
माता-पिता – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
उसके ऐसा है नहीं अपनापन में आन। पिता आपही अवनि में हैं अपना उपमान।1। मिले न खोजे भी कहीं खोजा सकल जहान। माता सी ममतामयी पाता पिता समान।2। जो न पालता पिता क्यों पलना सकता पाल। माता के लालन बिना लाल न बनते लाल।3।
सौ बातों की एक बात है – रमानाथ अवस्थी
सौ बातों की एक बात है । रोज़ सवेरे रवि आता है दुनिया को दिन दे जाता है लेकिन जब तम इसे निगलता होती जग में किसे विकलता सुख के साथी तो अनगिन हैं लेकिन दुःख के बहुत कठिन हैं सौ बातो की एक बात है |
लहरों का गीत – सुमित्रानंदन पंत
अपने ही सुख से चिर चंचल हम खिल खिल पडती हैं प्रतिपल, जीवन के फेनिल मोती को ले ले चल करतल में टलमल!
गुणगान – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
गणपति गौरी-पति गिरा गोपति गुरु गोविन्द। गुण गावो वन्दन करो पावन पद अरविन्द।1। देव भाव मन में भरे दल अदेव अहमेव। गिरि गुरुता से हैं अधिक गौरव में गुरुदेव।2। पाप-पुंज को पीस गुरु त्रिविध ताप कर दूर। हैं भरते उर-भवन में भक्ति-भाव भरपूर।3।
ऐसी तो कोई बात नहीं – रमानाथ अवस्थी
तुमसे भी छिपा सकूँ जो मै ऐसी तो कोई बात नहीं जीवन में | मन दिया तुम्हें मैंने ही अपने मन से रंग दिया तुम्हें मैंने अपने जीवन से बीते सपनो में आए बिना तुम्हारे ऐसी तो कोई रात नहीं जीवन में
सांध्य वंदना – सुमित्रानंदन पंत
जीवन का श्रम ताप हरो हे! सुख सुषुमा के मधुर स्वर्ण हे! सूने जग गृह द्वार भरो हे! लौटे गृह सब श्रान्त चराचर नीरव, तरु अधरों पर मर्मर, करुणानत निज कर पल्लव से विश्व नीड प्रच्छाय करो हे!
आदर्श – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
लोक को रुलाता जो था राम ने रुलाया उसे हम खल खलता के खले हैं कलपते। काँपता भुवन का कँपाने वाला उन्हें देख हम हैं बिलोक बल-वाले को बिलपते। हरिऔधा वे थे ताप-दाता ताप-दायकों के हम नित नये ताप से हैं आप तपते। रोम रोम में जो राम-काम रमता है नहीं नाम के लिए तो राम नाम क्या हैं जपते।1।
बुलावा – रमानाथ अवस्थी
प्यार से मुझको बुलाओगे जहाँ एक क्या सौ बार आऊँगा वहाँ पूछने की है नहीं फ़ुर्सत मुझे कौन हो तुम क्या तुम्हारा नाम है किस लिए मुझको बुलाते हो कहाँ कौन सा मुझसे तुम्हारा काम है
जग के उर्वर-आँगन में – सुमित्रानंदन पंत
जग के उर्वर-आँगन में बरसो ज्योतिर्मय जीवन! बरसो लघु-लघु तृण, तरु पर हे चिर-अव्यय, चिर-नूतन!



