विजय – सुमित्रानंदन पंत

मैं चिर श्रद्धा लेकर आई  वह साध बनी प्रिय परिचय में,  मैं भक्ति हृदय में भर लाई,  वह प्रीति बनी उर परिणय में।  जिज्ञासा से था आकुल मन  वह मिटी, हुई कब तन्मय मैं,  विश्वास माँगती थी प्रतिक्षण  आधार पा गई निश्चय मैं ! 

उद्बोधन – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

वेदों की है न वह महिमा धर्म ध्वंस होता। आचारों का निपतन हुआ लुप्त जातीयता है। विप्रो खोलो नयन अब है आर्यता भी विपन्ना। शीलों की है मलिन प्रभुता सभ्यता वंचिता है।1। सच्चे भावों सहित जिन के राम ने पाँव पूजे। पाई धोके चरण जिन के कृष्ण ने अग्र पूजा। होते वांछा विवश इतने आज वे विप्र क्यों हैं। जिज्ञासू हो निकट जिन के बुध्द ने सिध्दि पाई।2।

मन चाहिए – रमानाथ अवस्थी

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए ! थककर बैठो नहीं प्रतीक्षा कर रहा कोई कहीं हारे नहीं जब हौसले तब कम हुये सब फासले दूरी कहीं कोई नहीं केवल समर्पण चाहिए 

गंगा – सुमित्रानंदन पंत

निर्वाणोन्मुख आदर्शों के अंतिम दीप शिखोदय!-- जिनकी ज्योति छटा के क्षण से प्लावित आज दिगंचल,--  गत आदर्शों का अभिभव ही मानव आत्मा की जय, अत: पराजय आज तुम्हारी जय से चिर लोकोज्वल!

पुष्पांजलि – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

राम चरित सरसिज मधुप पावन चरित नितान्त। जय तुलसी कवि कुल तिलक कविता कामिनि कान्त।1। सुरसरि धारा सी सरस पूत परम रमणीय। है तुलसी की कल्पना कल्पलता कमनीय।2।

मेरी रचना के अर्थ – रमानाथ अवस्थी

मेरी रचना के अर्थ बहुत से हैं जो भी तुमसे लग जाए लगा लेना । मैं गीत लुटाता हूँ उन लोगों पर दुनिया में जिनका कोई आधार नहीं मैं आँख मिलाता हूँ उन आँखों से जिनका कोई भी पहरेदार नहीं । आँखों की भाषाएँ तो अनगिन हैं  जो भी सुंदर हो समझा देना

याद – सुमित्रानंदन पंत

बिदा हो गई साँझ, विनत मुख पर झीना आँचल धर, मेरे एकाकी आँगन में मौन मधुर स्मृतियाँ भर! वह केसरी दुकूल अभी भी फहरा रहा क्षितिज पर, नव असाढ़ के मेघों से घिर रहा बराबर अंबर!

हमारे वेद – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

अभी नर जनम की बजी भी बधाई। रही आँख सुधा बुधा अभी खोल पाई। समझ बूझ थी जिन दिनों हाथ आई। रही जब उपज की झलक ही दिखाई। कहीं की अंधेरी न थी जब कि टूटी। न थी ज्ञान सूरज किरण जब कि फूटी।1। तभी एक न्यारी कला रंग लाई। हमारे बड़ों के उरों में समाई। दिखा पंथ पारस बनी काम आई। फबी और फूली फली जगमगाई। उसी से हुआ सब जगत में उँजाला। गया मूल सारे मतों का निकाला।2

हम-तुम – रमानाथ अवस्थी

जीवन कभी सूना न हो कुछ मैं कहूँ, कुछ तुम कहो। तुमने मुझे अपना लिया यह तो बड़ा अच्छा किया जिस सत्य से मैं दूर था वह पास तुमने ला दिया अब ज़िन्दगी की धार में कुछ मैं बहूँ, कुछ तुम बहो

वायु के प्रति – सुमित्रानंदन पंत

प्राण! तुम लघु लघु गात!  नील नभ के निकुंज में लीन,  नित्य नीरव, नि:संग नवीन,  निखिल छवि की छवि! तुम छवि हीन  अप्सरी-सी अज्ञात!