ये जो बतियाँ जग रही है राहों पर ये रौशनी दे रही है या अँधेरा मुझे नहीं पता
Category: उर्दू शायरी
कहा मैंने – मीर तकी “मीर”
कहा मैंने कितना है गुल का सबात कली ने यह सुनकर तब्बसुम किया जिगर ही में एक क़तरा खूं है सरकश पलक तक गया तो तलातुम किया
आए हैं मीर मुँह को बनाए – मीर तकी “मीर”
आए हैं मीर मुँह को बनाए जफ़ा से आज शायद बिगड़ गयी है उस बेवफा से आज जीने में इख्तियार नहीं वरना हमनशीं हम चाहते हैं मौत तो अपने खुदा से आज
ग़म मौत का नहीं है – गुलज़ार
ग़म मौत का नहीं है, ग़म ये के आखिरी वक़्त भी तू मेरे घर नहीं है.... निचोड़ अपनी आँखों को,
झुकी झुकी सी नज़र – कैफ़ि आज़मी
झुकी झुकी सी नज़र बेक़रार है कि नहीं दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं
दिया है दिल – मिर्ज़ा ग़ालिब
दिया है दिल अगर उस को , बशर है क्या कहिये हुआ रक़ीब तो वो , नामाबर है , क्या कहिये यह ज़िद की आज न आये और आये बिन न रहे काजा से शिकवा हमें किस क़दर है , क्या कहिये
अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा – मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा जिस दिल पे नाज़ था मुझे वो दिल नहीं रहा जाता हूँ दाग़-ए-हसरत-ए-हस्ती लिये हुए हूँ शम्मा-ए-कुश्ता दरख़ुर-ए-महफ़िल नहीं रहा
हुस्ना – पीयूष मिश्रा
लाहौर के उस पहले जिले के दो परगना में पहुंचे रेशम गली के दूजे कूचे के चौथे मकां में पहुंचे
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है – मिर्ज़ा ग़ालिब
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है? तुम ही कहो कि ये अंदाज़-ए-ग़ुफ़्तगू क्या है?
मेरे कुछ सवाल हैं – ज़ाकिर खान
मेरे कुछ सवाल हैं जो सिर्फ़ क़यामत के रोज़ पूछूँगा तुमसे, क्यूँकि उसके पहले तुम्हारी और मेरी बात हो सके इस लायक नहीं हो तुम ।








