चलो फिर से मुस्कुराएं – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

जो गुज़र गयी हैं रातें उन्हें फिर जगा के लाएं जो बिसर गयी हैं बातें उन्हें याद में बुलायें

कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

वो लोग बहुत ख़ुशक़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते जी मसरूफ़ रहे

दिल ही तो है – मिर्ज़ा ग़ालिब

दिल ही तो है न संग-ओ-ख़ीश्त दर्द से भर न आये क्यूँ रोयेंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताये क्यूँ

यूँ होता तो क्या होता – मिर्ज़ा ग़ालिब

न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता, डुबोया मुझको होने ने न मैं होता तो क्या होता !

किताबें – गुलज़ार

किताबें झाँकती हैं बंद आलमारी के शीशों से,  बड़ी हसरत से तकती हैं महीनों अब मुलाकातें नहीं होती जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं

आमों की तारीफ़ में – मिर्ज़ा ग़ालिब

हाँ दिल-ए-दर्दमंद ज़म-ज़मा साज़ क्यूँ न खोले दर-ए-ख़ज़िना-ए-राज़ ख़ामे का सफ़्हे पर रवाँ होना शाख़-ए-गुल का है गुल-फ़िशाँ होना

बीते रिश्ते तलाश करती है – गुलज़ार

बीते रिश्ते तलाश करती है ख़ुशबू ग़ुंचे तलाश करती है