कविता संग्रह

वो एक दिन – रुचिका मान ‘रूह’

एक दिन जब हम साथ न रहेंगे, और तुम्हे अनायास ही मेरा ख़याल आएगा, हताश मत होना.  तुम मुझे वहीं पाओगे

आओ फिर से दिया जलाएँ – अटल बिहारी वाजपेयी

आओ फिर से दिया जलाएँ भरी दुपहरी में अंधियारा सूरज परछाई से हारा अंतरतम का नेह निचोड़ें- बुझी हुई बाती सुलगाएँ। आओ फिर से दिया जलाएँ

फूल और काँटा – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

हैं जन्म लेते जगह में एक ही, एक ही पौधा उन्हें है पालता रात में उन पर चमकता चाँद भी, एक ही सी चाँदनी है डालता। है खटकता एक सबकी आँख में दूसरा है सोहता सुर शीश पर, किस तरह कुल की बड़ाई काम दे जो किसी में हो बड़प्पन की कसर।

आपकी याद आती रही रात-भर – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

"आपकी याद आती रही रात-भर" चाँदनी दिल दुखाती रही रात-भर गाह जलती हुई, गाह बुझती हुई शम-ए-ग़म झिलमिलाती रही रात-भर

the last letter – कुमार शान्तनु

आज कल दुनिया में कुछ ऐसा उठ रहा है तूफ़ान, की बात बात पर "हक़" मांग बैठता है हर इंसान।

एक बरस बीत गया – अटल बिहारी वाजपेयी

एक बरस बीत गया    झुलासाता जेठ मास  शरद चांदनी उदास  सिसकी भरते सावन का  अंतर्घट रीत गया  एक बरस बीत गया 

कोयल – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

काली-काली कू-कू करती, जो है डाली-डाली फिरती!        कुछ अपनी हीं धुन में ऐंठी         छिपी हरे पत्तों में बैठी जो पंचम सुर में गाती है वह हीं कोयल कहलाती है.         जब जाड़ा कम हो जाता है          सूरज थोड़ा गरमाता है 

इस वतन के वास्ते – सोमिल जैन ‘सोमू’

जर जमीन एक करदी,इस वतन के वास्ते। खून से कस्तियाँ लिख दी,इस वतन के वास्ते। हँसते हँसते सूली चढ़ गये, इस वतन के वास्ते।

ऐ ज़िन्दगी गले लगा ले – गुलज़ार

मुझे खर्ची में पूरा एक दिन, हर रोज़ मिलता है मगर हर रोज़ कोई छीन लेता है, झपट लेता है, अंटी से कभी खीसे से गिर पड़ता है तो गिरने की आहट भी नहीं होती,

मीठी बोली – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

बस में जिससे हो जाते हैं प्राणी सारे। जन जिससे बन जाते हैं आँखों के तारे। पत्थर को पिघलाकर मोम बनानेवाली मुख खोलो तो मीठी बोली बोलो प्यारे।। रगड़ो, झगड़ो का कडुवापन खोनेवाली। जी में लगी हुई काई को धानेवाली। सदा जोड़ देनेवाली जो टूटा नाता मीठी बोली प्यार बीज है बोनेवाली।। काँटों में भी सुंदर फूल खिलानेवाली।