कविता संग्रह

मौत से ठन गई – अटल बिहारी वाजपेयी

ठन गई!  मौत से ठन गई!  जूझने का मेरा इरादा न था,  मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,  रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,  यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई। 

आ री नींद – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

आ री नींद, लाल को आ जा। उसको करके प्यार सुला जा।। तुझे लाल हैं ललक बुलाते। अपनी आँखों पर बिठलाते।। तेरे लिए बिछाई पलकें। बढ़ती ही जाती हैं ललकें।। क्यों तू है इतनी इठलाती। आ-आ मैं हूँ तुझे बुलाती।। गोद नींद की है अति प्यारी। फूलों से है सजी-सँवारी।।

जीवन की ढलने लगी सांझ – अटल बिहारी वाजपेयी

जीवन की ढलने लगी सांझ उमर घट गई डगर कट गई जीवन की ढलने लगी सांझ।

तेरी मेरी बातें – सोमिल जैन ‘सोमू’

तेरी मेरी बातें... चलो कुछ बात करते हैं चुप्पी को तोड़ते हैं दरमिया तेरे मेरे दिल की बातो को टटोलते हैं मोसम तो खुशनुमा है मगर ये सन्नाटा क्यों है तेरे मेरे बीच में कम्बक्त ये आता क्यों है चलो इस सन्नाटे को खोल लेते है चलो कुछ बोल लेते हैं।

मेरी कहानी – सोमिल जैन ‘सोमू’

पूछता हूँ ये समां से,पूछता हूँ ये अमां से। यदि फुर्सत हो तुम्हें तो,पूछता हूँ ये जमां से। क्या यही मेरी कहानी क्यों सजा आँखों में पानी... मैं भी था एक सुखी मानुष,थोड़ा चंचल बहुत ख्वाहिश। मिले सब संयोग मुझको,मगर ये क्या हुआ तुझको। एक दिन सब टूट बिखरा,अंधकारी सूर्य उखरा। छोड़ कर चल दिए मुझको ,सम्हालेगा कौन मुझको। आज हारा हूँ कभी में,जो न होता खेल खेला। पूछता हूँ हाथ मेरा,छोड़ क्यों छोड़ा अकेला। ले ली सबने साँस ठण्डी,भूलकर जलती कहानी। आग है उर में मेरे,क्यों सजा आँखों में पानी।

एक नन्हा दीपक – सोमिल जैन ‘सोमू’

इन काली काली रातों में,एक नन्हा दीपक जलता है। मगर अफ़सोस वो बेजुबाँ,क्यों बिखरा बिखरा रहता है,क्यों उखड़ा उखड़ा रहता है। इन गम के तुफानो में,कंही महफूज पलता है। सांसे न रुक जाएँ कभी,लहरों से बचकर छिपता है,लहरों से बचकर जलता है।         इन काली काली..........

हर युग को अपना ‘राम’ चाहिए – अनिल कुमार सिंह

हर युग को अपना 'राम' चाहिए - अनिल कुमार सिंह

न मैं चुप हूँ न गाता हूँ  – अटल बिहारी वाजपेयी

न मैं चुप हूँ न गाता हूँ  सवेरा है मगर पूरब दिशा में  घिर रहे बादल  रूई से धुंधलके में  मील के पत्थर पड़े घायल  ठिठके पाँव  ओझल गाँव 

दो गज – विकास कुमार

कब ये दुनिया पलट जाये कब ये ताज बेताज हो जाये हुकूमत रहती नहीं हमेशा चन्द साँसों की ये दुनिया है मोहताज कुछ ख्वाबों की आबादी बढ़ न सकेगी जमीं पर संसाधनों के पार, हुक्मरानों की पाबंदी है प्रकृती के ख़ज़ानों पर,

इरेज़र – प्रिया आर्य “दीवानी’

चीजो की कीमत नहीं होती वक़्त उनकी कीमत तय करता  है। गमो का खजाना है ,मेरे पास देखे कितने दाम में अब ये बिकता है। इस दौर में ख़रीदलो तुम मुझको भी पर जो है ही नहीं , देखें हम भी कैसे बिकता है।