कविता संग्रह

लला फिर आइयो खेलन होरी – पद्माकर

फागु की भीर, अभीरिन में गहि गोंवदै लै गई भीतर गोरी। भाई करी मन की पद्माकर, ऊपर नाई अबीर की झोरी छीनि पितंबर कम्मर तें सु बिदा दई मीड़ि कपोलन रोरी। नैन नचाय कही मुसुकाय, 'लला फिर आइयो खेलन होरी

हिरोशिमा की पीड़ा – अटल बिहारी वाजपेयी

किसी रात को  मेरी नींद चानक उचट जाती है  आँख खुल जाती है  मैं सोचने लगता हूँ कि  जिन वैज्ञानिकों ने अणु अस्त्रों का  आविष्कार किया था  वे हिरोशिमा-नागासाकी के भीषण 

सितम की रस्में – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

सितम की रस्में बहुत थीं लेकिन, न थी तेरी अंजुमन से पहले सज़ा खता-ए-नज़र से पहले, इताब ज़ुर्मे-सुखन से पहले  जो चल सको तो चलो के राहे-वफा बहुत मुख्तसर हुई है मुक़ाम है अब कोई न मंजिल, फराज़े-दारो-रसन से पहले 

वो पल आँसू दे जाते हैं – सोमिल जैन ‘सोमू’

वो पल आँसू दे जाते हैं  हम कई यादे छोड़ जाते हैं कई अधूरी बातें छोड़ जाते हैं ।।।।। जो न हुयी, शायद न होनी थी, वो मुलाकातें छोड़ जाते हैं।

ऊँचाई – अटल बिहारी वाजपेयी

ऊँचे पहाड़ पर,  पेड़ नहीं लगते,  पौधे नहीं उगते,  न घास ही जमती है।  जमती है सिर्फ बर्फ, जो, कफ़न की तरह सफ़ेद और, मौत की तरह ठंडी होती है। खेलती, खिलखिलाती नदी, जिसका रूप धारण कर, अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है।

शफ़क़ की राख में – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

शाख़ पर ख़ूने-गुल रवाँ है वही शोख़ी-ए-रंगे-गुलसिताँ है वही  सर वही है तो आस्ताँ है वही जाँ वही है तो जाने-जाँ है वही  अब जहाँ मेहरबाँ नहीं कोई कूचः-ए-यारे-मेहरबाँ है वही 

शाख़ पर ख़ूने-गुल रवाँ है वही – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

शाख़ पर ख़ूने-गुल रवाँ है वही शोख़ी-ए-रंगे-गुलसिताँ है वही  सर वही है तो आस्ताँ है वही जाँ वही है तो जाने-जाँ है वही  अब जहाँ मेहरबाँ नहीं कोई कूचः-ए-यारे-मेहरबाँ है वही 

क्या खोया, क्या पाया – अटल बिहारी वाजपेयी

क्या खोया, क्या पाया जग में मिलते और बिछुड़ते मग में मुझे किसी से नहीं शिकायत यद्यपि छला गया पग-पग में एक दृष्टि बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें!

बदलाव – रुचिका मान ‘रूह’

ये कैसा विमूढ़ता का पुलिंदा लिये बैठे हो? सुना नहीं तुमने कि शहर बदल रहा है? ऐसे निरीह कब हुए तुम? यहां की रिवायतों से इतने अनजान तो कभी नहीं थे... तुम तो उत्साहित थे.... नव- उत्तेजना का दौर है,

सब क़त्ल होके – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

सब क़त्ल होके तेरे मुक़ाबिल से आये हैं हम लोग सुर्ख-रू हैं कि मंजिल से आये हैं  शम्मए नज़र, खयाल के अंजुम, जिगर के दाग़ जितने चिराग़ हैं तेरी महफ़िल से आये हैं