कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए ! थककर बैठो नहीं प्रतीक्षा कर रहा कोई कहीं हारे नहीं जब हौसले तब कम हुये सब फासले दूरी कहीं कोई नहीं केवल समर्पण चाहिए
कविता संग्रह
गंगा – सुमित्रानंदन पंत
निर्वाणोन्मुख आदर्शों के अंतिम दीप शिखोदय!-- जिनकी ज्योति छटा के क्षण से प्लावित आज दिगंचल,-- गत आदर्शों का अभिभव ही मानव आत्मा की जय, अत: पराजय आज तुम्हारी जय से चिर लोकोज्वल!
आज सोचा तो आँसू भर आए – कैफ़ि आज़मी
आज सोचा तो आँसू भर आए मुद्दतें हो गईं मुस्कुराए हर कदम पर उधर मुड़ के देखा उनकी महफ़िल से हम उठ तो आए दिल की नाज़ुक रगें टूटती हैं याद इतना भी कोई न आए
पुष्पांजलि – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
राम चरित सरसिज मधुप पावन चरित नितान्त। जय तुलसी कवि कुल तिलक कविता कामिनि कान्त।1। सुरसरि धारा सी सरस पूत परम रमणीय। है तुलसी की कल्पना कल्पलता कमनीय।2।
मेरी रचना के अर्थ – रमानाथ अवस्थी
मेरी रचना के अर्थ बहुत से हैं जो भी तुमसे लग जाए लगा लेना । मैं गीत लुटाता हूँ उन लोगों पर दुनिया में जिनका कोई आधार नहीं मैं आँख मिलाता हूँ उन आँखों से जिनका कोई भी पहरेदार नहीं । आँखों की भाषाएँ तो अनगिन हैं जो भी सुंदर हो समझा देना
याद – सुमित्रानंदन पंत
बिदा हो गई साँझ, विनत मुख पर झीना आँचल धर, मेरे एकाकी आँगन में मौन मधुर स्मृतियाँ भर! वह केसरी दुकूल अभी भी फहरा रहा क्षितिज पर, नव असाढ़ के मेघों से घिर रहा बराबर अंबर!
हमारे वेद – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
अभी नर जनम की बजी भी बधाई। रही आँख सुधा बुधा अभी खोल पाई। समझ बूझ थी जिन दिनों हाथ आई। रही जब उपज की झलक ही दिखाई। कहीं की अंधेरी न थी जब कि टूटी। न थी ज्ञान सूरज किरण जब कि फूटी।1। तभी एक न्यारी कला रंग लाई। हमारे बड़ों के उरों में समाई। दिखा पंथ पारस बनी काम आई। फबी और फूली फली जगमगाई। उसी से हुआ सब जगत में उँजाला। गया मूल सारे मतों का निकाला।2
आज की रात – कैफ़ि आज़मी
आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है, आज की रात न फ़ुटपाथ पे नींद आएगी, सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी उठो, कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी । ये जमीं तब भी निगल लेने को आमादा थी, पाँव जब टूटती शाखों से उतारे हमने, इन मकानों को ख़बर है न, मकीनों[1] को ख़बर उन दिनों की जो गुफ़ाओं में गुज़ारे हमने ।
हम-तुम – रमानाथ अवस्थी
जीवन कभी सूना न हो कुछ मैं कहूँ, कुछ तुम कहो। तुमने मुझे अपना लिया यह तो बड़ा अच्छा किया जिस सत्य से मैं दूर था वह पास तुमने ला दिया अब ज़िन्दगी की धार में कुछ मैं बहूँ, कुछ तुम बहो
वायु के प्रति – सुमित्रानंदन पंत
प्राण! तुम लघु लघु गात! नील नभ के निकुंज में लीन, नित्य नीरव, नि:संग नवीन, निखिल छवि की छवि! तुम छवि हीन अप्सरी-सी अज्ञात!




