दस्तूर क्या ये शहरे-सितमगर – कैफ़ि आज़मी

दस्तूर[1] क्या ये शहरे-सितमगर[2] के हो गए ।
जो सर उठा के निकले थे बे सर के हो गए ।

ये शहर तो है आप का, आवाज़ किस की थी
देखा जो मुड़ के हमने तो पत्थर के हो गए ।

जब सर ढका तो पाँव खुले फिर ये सर खुला
टुकड़े इसी में पुरखों की चादर के हो गए ।

दिल में कोई सनम ही बचा, न ख़ुदा रहा
इस शहर पे ज़ुल्म भी लश्कर के हो गए ।

हम पे बहुत हँसे थे फ़रिश्ते सो देख लें
हम भी क़रीब गुम्बदे-बेदर[3] के हो गए ।

– कैफ़ि आज़मी

शब्दार्थ
  1. प्रचलन
  2. अन्याय का शहर, प्रिय का शहर
  3. आकाश

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