कविता संग्रह

मैं ढूँढता हूँ – कैफ़ि आज़मी

मैं ढूँढता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलता नई ज़मीं नया आसमाँ नहीं मिलता नई ज़मीं नया आसमाँ मिल भी जाये नए बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलता वो तेग़ मिल गई जिससे हुआ है क़त्ल मेरा किसी के हाथ का उस पर निशाँ नहीं मिलता

महात्मा जी के प्रति – सुमित्रानंदन पंत

निर्वाणोन्मुख आदर्शों के अंतिम दीप शिखोदय!-- जिनकी ज्योति छटा के क्षण से प्लावित आज दिगंचल,--  गत आदर्शों का अभिभव ही मानव आत्मा की जय, अत: पराजय आज तुम्हारी जय से चिर लोकोज्वल!

कृतज्ञता – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

माली की डाली के बिकसे कुसुम बिलोक एक बाला। बोली ऐ मति भोले कुसुमो खल से तुम्हें पड़ा पाला। विकसित होते ही वह नित आ तुम्हें तोड़ ले जाता है। उदर-परायणता वश पामर तनिक दया नहिं लाता है।1।

बासरी बजाय आज रंगसो मुरारी – सूरदास

बासरी बजाय आज रंगसो मुरारी ।  शिव समाधि भूलि गयी मुनि मनकी तारी ॥ बा०॥ध्रु०॥ बेद भनत ब्रह्मा भुले भूले ब्रह्मचरी ।  सुनतही आनंद भयो लगी है करारी ॥ बास०॥१॥ रंभा सब ताल चूकी भूमी नृत्य कारी । 

देख देख एक बाला जोगी – सूरदास

देख देख एक बाला जोगी द्वारे मेरे आया हो ॥ध्रु०॥ पीतपीतांबर गंगा बिराजे अंग बिभूती लगाया हो ।  तीन नेत्र अरु तिलक चंद्रमा जोगी जटा बनाया हो ॥१॥ भिछा ले निकसी नंदरानी मोतीयन थाल भराया हो । 

क्योंकि एक औरत थी वो – शिवम कनोजे

कभी कोख़ में लड़ी थी वो कभी कोख़ से लड़ी थी वो, कभी चंद रुपयों में बिकी थी वो, कभी दहेज़ के नाम पर ख़रीदी गई थी वो, कभी अपने ही घर में बंधी थी वो, तो कभी औरों के घर की बंदी थी वो, कभी औरों ने उसे सिर का ताज बनाया,

पत्थर के ख़ुदा – कैफ़ि आज़मी

पत्थर के ख़ुदा वहाँ भी पाए । हम चाँद से आज लौट आए । दीवारें तो हर तरफ़ खड़ी हैं क्या हो गया मेहरबान साए । जंगल की हवाएँ आ रही हैं काग़ज़ का ये शहर उड़ न जाए ।

आज शर्मसार हूँ – शिवम कनोजे

हाँ, मैं भारतीय हूँ कभी गर्व था इस बात पर, लेकिन आज शर्मिंदा हूँ, हाँ, कभी गर्व करता था, शहादत पर जवानों की, आज बेमतलब हो गयी वो शहादत, औरों से बचाते रहे,इस देश को, पर अपनों ने ही नोंच खाया, आज शर्मसार हूँ, भारतीय होने पर अपने,

मैं समझ नहीं पाया – शिवम कनोजे

आज मैं किसी से मिला, वो बूढ़ेपन की खीझ थी, या देश पर गुस्सा , मैं समझ नहीं पाया।

उम्मीन्द थी ज़िंदगी से तुम मेरी – शिवम् कनोजे

उम्मीन्द थी ज़िंदगी से तुम मेरी, अब ग़ुरूर हो खुद पर मेरा दर्द था दिल में कुछ मेरे, अब राहत हो दिल की तुम मेरी, दास्तां सुनी थी सच्चे इश्क़ की कुछ, ख़ौफ़नाक थी सारी, सोच बदल दी तुमने मेरी, अब हसीं लगता हैं सब कुछ,