लाई फिर इक लग़्ज़िशे-मस्ताना तेरे शहर में । फिर बनेंगी मस्जिदें मयख़ाना तेरे शहर में । आज फिर टूटेंगी तेरे घर की नाज़ुक खिड़कियाँ आज फिर देखा गया दीवाना तेरे शहर में ।
कविता संग्रह
ये न थी हमारी क़िस्मत – मिर्ज़ा ग़ालिब
ये न थी हमारी क़िस्मत के विसाले यार होता अगर और जीते रहते यही इन्तज़ार होता
पूसी बिल्ली – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
पूसी बिल्ली, पूसी बिल्ली कहाँ गई थी? राजधानी देखने मैं दिल्ली गई थी!
मधुरीसी बेन बजायके – सूरदास
मधुरीसी बेन बजायके । मेरो मन मोह्यो सांवरा ॥ध्रु०॥ मेरे आंगनमें बांसको बेडलो सिंचो मन चित्त लायके । अब तो बेरण भई बासरी मोहन मुखपर आयके ॥सां०॥१॥ मैं जल जमुना भरन जातरी मारग रोक्यो आयके ।
बेघर – जावेद अख़्तर
शाम होने को है लाल सूरज समंदर में खोने को है और उसके परे कुछ परिन्दे क़तारें बनाए उन्हीं जंगलों को चले
मैं अपने से डरती हूँ सखि – माखनलाल चतुर्वेदी
मैं अपने से डरती हूँ सखि ! पल पर पल चढ़ते जाते हैं, पद-आहट बिन, रो! चुपचाप बिना बुलाये आते हैं दिन, मास, वरस ये अपने-आप; लोग कहें चढ़ चली उमर में पर मैं नित्य उतरती हूँ सखि ! मैं अपने से डरती हूँ सखि !
सेवा – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
देख पड़ी अनुराग-राग-रंजित रवितन में। छबि पाई भर विपुल-विभा नीलाभ-गगन में। बर-आभा कर दान ककुभ को दुति से दमकी। अन्तरिक्ष को चारु ज्योतिमयता दे चमकी। कर संक्रान्ति गिरि-सानु-सकल को कान्त दिखाई।
लश्कर के ज़ुल्म – कैफ़ि आज़मी
दस्तूर क्या ये शहरे-सितमगर के हो गए जो सर उठा के निकले थे बे-सर के हो गए ये शहर तो है आप का, आवाज़ किस की थी देखा जो मुड़ के हमने तो पत्थर के हो गए
अज़ मेहर ता-ब-ज़र्रा दिल-ओ-दिल है आइना – मिर्ज़ा ग़ालिब
अज़ मेहर ता-ब-ज़र्रा दिल-ओ-दिल है आइना तूती को शश जिहत से मुक़ाबिल है आइना
चल मेरी ढोलकी – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
चल मेरी ढोलकी ढमाक-ढम, नानी के घर जाते हम। चल मेरी ढोलकी ढमाक-ढम नहीं रुकेंगे कहीं भी हम!







