क्यों मुझे तुम खींच लाये? एक गो-पद था, भला था, कब किसी के काम का था? क्षुद्ध तरलाई गरीबिन अरे कहाँ उलीच लाये?
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नादान – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
कर सकेंगे क्या वे नादान। बिन सयानपन होते जो हैं बनते बड़े सयान। कौआ कान ले गया सुन जो नहिं टटोलते कान। वे क्यों सोचें तोड़ तरैया लाना है आसान।1। है नादान सदा नादान। काक सुनाता कभी नहीं है कोकिल की सी तान। बक सब काल रहेगा बक ही वही रहेगी बान। उसको होगी नहीं हंस लौं नीर छीर पहचान।2।
एक काठ का टुकड़ा – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
जलप्रवाह में एक काठ का टुकड़ा बहता जाता था। उसे देख कर बार बार यह मेरे जी में आता था। पाहन लौं किसलिए उसे भी नहीं डुबाती जल-धारा। एक किसलिए प्रतिद्वन्दी है और दूसरा है प्यारा। मैं विचार में डूबा ही था इतने में यह बात सुनी। जो सुउक्ति कुसुमावलि में से गयी रही रुचि साथ चुनी।
अमर राष्ट्र – माखनलाल चतुर्वेदी
छोड़ चले, ले तेरी कुटिया, यह लुटिया-डोरी ले अपनी, फिर वह पापड़ नहीं बेलने; फिर वह माल पडे न जपनी। यह जागृति तेरी तू ले-ले, मुझको मेरा दे-दे सपना, तेरे शीतल सिंहासन से सुखकर सौ युग ज्वाला तपना।
जवानी – माखनलाल चतुर्वेदी
प्राण अन्तर में लिये, पागल जवानी ! कौन कहता है कि तू विधवा हुई, खो आज पानी?
कृतज्ञता – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
माली की डाली के बिकसे कुसुम बिलोक एक बाला। बोली ऐ मति भोले कुसुमो खल से तुम्हें पड़ा पाला। विकसित होते ही वह नित आ तुम्हें तोड़ ले जाता है। उदर-परायणता वश पामर तनिक दया नहिं लाता है
चपला – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
चपले! क्यों चमक-चमक कर मेघों में छिप जाती हो? क्यों रूप-छटा तुम अपनी दिखला कर भग जाती हो?॥1॥
सच ये है बेकार हमें ग़म होता है – जावेद अख़्तर
सच ये है बेकार हमें ग़म होता है जो चाहा था दुनिया में कम होता है ढलता सूरज फैला जंगल रस्ता गुम हमसे पूछो कैसा आलम होता है
बलि-पन्थी से – माखनलाल चतुर्वेदी
कौन पथ भूले, कि आये ! स्नेह मुझसे दूर रहकर मत व्यर्थ पुकारे शूल-शूल, कह फूल-फूल, सह फूल-फूल। हरि को ही-तल में बन्द किये, केहरि से कह नख हूल-हूल।
बन-कुसुम – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
एक कुसुम कमनीय म्लान हो सूख विखर कर। पड़ा हुआ था धूल भरा अवनीतल ऊपर। उसे देख कर एक सुजन का जी भर आया। वह कातरता सहित वचन यह मुख पर लाया




