जो न बने वे विमल लसे विधु-मौलि मौलि पर। जो न बने रमणीय सज, रमा-रमण कलेवर। बर बृन्दारक बृन्द पूज जो बने न बन्दित। जो न सके अभिनन्दनीय को कर अभिनन्दित। जो विमुग्धा कर हुए वे न बन मंजुल-माला।
Category: हिंदी कविताएँ
सरिता – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
सरिते! क्यों अविरल गति से प्रतिपल बहती रहती हो? क्षण-भर के लिए कहीं भी विश्राम क्यों न करती हो?॥1॥
रसिक सीर भो हेरी लगावत – सूरदास
रसिक सीर भो हेरी लगावत गावत राधा राधा नाम ॥ध्रु०॥ कुंजभवन बैठे मनमोहन अली गोहन सोहन सुख तेरोई गुण ग्राम ॥१॥
मुझको यक़ीं है सच कहती थीं – जावेद अख़्तर
मुझको यक़ीं है सच कहती थीं जो भी अम्मी कहती थीं जब मेरे बचपन के दिन थे चाँद में परियाँ रहती थीं एक ये दिन जब अपनों ने भी हमसे नाता तोड़ लिया एक वो दिन जब पेड़ की शाख़ें बोझ हमारा सहती थीं एक ये दिन जब सारी सड़कें रूठी-रूठी लगती हैं एक वो दिन जब 'आओ खेलें' सारी गलियाँ कहती थीं
वायु – माखनलाल चतुर्वेदी
चल पडी चुपचाप सन-सन-सन हवा, डालियों को यों चिढाने-सी लगी, आंख की कलियां, अरी, खोलो जरा, हिल स्वपतियों को जगाने-सी लगी,
अविनय – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
ढाल पसीना जिसे बड़े प्यारों से पाला। जिसके तन में सींच सींच जीवन-रस डाला। सुअंकुरित अवलोक जिसे फूला न समाया। पा करके पल्लवित जिसे पुलकित हो आया। वह पौधा यदि न सुफल फले तो कदापि न कुफल फले। अवलोक निराशा का बदन नीर न आँखों से ढले।
वर्षा – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
नभ के नीले आँगन में घनघोर घटा घिर आयी! इस मर्त्य-लोक को देने जीवन-सन्देशा लायी॥1॥
तुमको कमलनयन कबी गलत – सूरदास
तुमको कमलनयन कबी गलत ॥ध्रु०॥ बदन कमल उपमा यह साची ता गुनको प्रगटावत
दुश्वारी – जावेद अख़्तर
मैं भूल जाऊँ तुम्हें अब यही मुनासिब है मगर भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूँ कि तुम तो फिर भी हक़ीक़त हो कोई ख़्वाब नहीं यहाँ तो दिल का ये आलम है क्या कहूँ
सिपाही – माखनलाल चतुर्वेदी
गिनो न मेरी श्वास, छुए क्यों मुझे विपुल सम्मान? भूलो ऐ इतिहास, खरीदे हुए विश्व-ईमान !! अरि-मुड़ों का दान, रक्त-तर्पण भर का अभिमान,





