साथी, सब कुछ सहना होगा! – हरिवंशराय बच्चन

साथी, सब कुछ सहना होगा! मानव पर जगती का शासन, जगती पर संसृति का बंधन, संसृति को भी और किसी के प्रतिबंधो में रहना होगा! साथी, सब कुछ सहना होगा!

देवदास मत होना – कुमार विश्वास

खुद से भी मिल न सको, इतने पास मत होना इश्क़ तो करना, मगर देवदास मत होना देखना, चाहना, फिर माँगना, या खो देना ये सारे खेल हैं, इनमें उदास मत होना जो भी तुम चाहो, फ़क़त चाहने से मिल जाए ख़ास तो होना, पर इतने भी ख़ास मत होना

फितूर – विकास कुमार

प्रश्नों को , दायरे में ही रहने दो, जो कहते हैं हम  वही तुम होने दो। पथ्थरों को,  पूजती है दुनिया,  तो क्या------- इंसान जो पथ्थर हैं  पथ्थर ही रहने दो।

मधुर-मधुर मेरे दीपक – महादेवी वर्मा

मधुर-मधुर मेरे दीपक जल! युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल प्रियतम का पथ आलोकित कर! सौरभ फैला विपुल धूप बन मृदुल मोम-सा घुल रे, मृदु-तन! दे प्रकाश का सिन्धु अपरिमित, तेरे जीवन का अणु गल-गल पुलक-पुलक मेरे दीपक जल!

को‌ई गाता मैं सो जाता – हरिवंशराय बच्चन

संस्रिति के विस्तृत सागर में सपनो की नौका के अंदर दुख सुख कि लहरों मे उठ गिर बहता जाता, मैं सो जाता । आँखों में भरकर प्यार अमर आशीष हथेली में भरकर को‌ई मेरा सिर गोदी में रख सहलाता, मैं सो जाता ।

बया हमारी चिड़िया रानी – महादेवी वर्मा

तिनके लाकर महल बनाती, ऊँची डाली पर लटकाती, खेतों से फिर दाना लाती, नदियों से भर लाती पानी। तुझको दूर न जाने देंगे, दानों से आँगन भर देंगे, और हौज़ में भर देंगे हम- मीठा-मीठा ठंडा पानी।

दुःखी मत हो – कुमार विश्वास

सार्त्र! तुम्हें आदमी के अस्तित्व की चिंता है न? दुःखी मत हो दार्शनिक मैं तुम्हें सुझाता हूँ क्षणों को पूरे आत्मबोध के साथ जीते हुए आदमज़ाद की सही तस्वीर दिखाता हूँ- भागती ट्रामों दौड़ती कारों

अभीप्सा – विकास कुमार

भरी दोपहरी गर्म रेत तपते मरुथल बढ़ती पिपासा मरुधान हैं जिस ओर रे मन चल उस ओर

मिटने का अधिकार – महादेवी वर्मा

वे मुस्काते फूल, नहीं जिनको आता है मुरझाना, वे तारों के दीप, नहीं  जिनको भाता है बुझ जाना! 

किस कर में यह वीणा धर दूँ? – हरिवंशराय बच्चन

देवों ने था जिसे बनाया, देवों ने था जिसे बजाया, मानव के हाथों में कैसे इसको आज समर्पित कर दूँ? किस कर में यह वीणा धर दूँ?