कविता संग्रह

मुक्ति – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

तोड़ो, तोड़ो, तोड़ो कारा पत्थर, की निकलो फिर, गंगा-जल-धारा! गृह-गृह की पार्वती! पुनः सत्य-सुन्दर-शिव को सँवारती उर-उर की बनो आरती!-- भ्रान्तों की निश्चल ध्रुवतारा!-- तोड़ो, तोड़ो, तोड़ो कारा!

समस्या और समाधान – अमीक सरकार / कुमार शान्तनु

आज कल दुनिया में कुछ ऐसा उठ रहा है तूफ़ान, की बात बात पर "हक़" मांग बैठता है हर इंसान।

आग की फसल – विकास कुमार (अतिथि लेखक)

तुम अधूरे मैं अधूरा दिन अधूरे रात अधूरी भावनाएँ जो बह रहीं हैं उठ रहीं तरंग अधूरी

अधूरे से हम – विकास कुमार (अतिथि लेखक)

तुम अधूरे मैं अधूरा दिन अधूरे रात अधूरी भावनाएँ जो बह रहीं हैं उठ रहीं तरंग अधूरी

मौन – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

बैठ लें कुछ देर, आओ,एक पथ के पथिक-से प्रिय, अंत और अनन्त के, तम-गहन-जीवन घेर। मौन मधु हो जाए

अट नहीं रही है – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

अट नहीं रही है आभा फागुन की तन सट नहीं रही है।

कहूँ जो हाल, तो कहते हो – मिर्ज़ा ग़ालिब

कहूं जो हाल तो कहते हो 'मुद्द`आ कहिये' तुम्हीं कहो कि जो तुम यूं कहो तो क्या कहिये न कहियो त`न से फिर तुम कि हम सितमगर हैं मुझे तो ख़ू है कि जो कुछ कहो बजा कहिये

बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु! पूछेगा सारा गाँव, बंधु!

गीत –  ज्ञान प्रकाश सिंह

आज सूर्य की अंतिम किरणें , दुर्बल क्षीण मलिन अलसाई , आज नहीं निर्झर के जल में , संध्या रूप निरखने आई ।

एक पल में एक सदी का मज़ा हमसे पूछिए – ख़ुमार बाराबंकवी

एक पल में एक सदी का मज़ा हमसे पूछिए , दो दिन की ज़िन्दगी का मज़ा हमसे पूछिए !