कविता संग्रह

गीत मेरे – हरिवंशराय बच्चन

गीत मेरे, देहरी का दीप-सा बन। एक दुनिया है हृदय में, मानता हूँ, वह घिरी तम से, इसे भी जानता हूँ, छा रहा है किंतु बाहर भी तिमिर-घन, गीत मेरे, देहरी का द‍ीप-सा बन।

अब वही हर्फ़-ए-जुनूँ सबकी ज़ुबाँ ठहरी है – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

अब वही हर्फ़-ए-जुनूँ सबकी ज़ुबाँ ठहरी है जो भी चल निकली है, वो बात कहाँ ठहरी है आज तक शैख़ के इकराम में जो शै थी हराम अब वही दुश्मने-दीं राहते-जाँ ठहरी है है ख़बर गर्म के फिरता है गुरेज़ाँ नासेह गुफ़्तगू आज सरे-कू-ए-बुताँ ठहरी है

कुछ बातें हैं… – विकाश कुमार

कुछ बातें हैं तुम कहो तो बता दूँ ‬ सब अच्छा कुछ बुरा भी जता दूँ बड़ी शिद्दत से पहुँचा हूँ मंज़िल पर कुछ याद आए तो घर का पता दूँ

साथी, साँझ लगी अब होने! – हरिवंशराय बच्चन

फैलाया था जिन्हें गगन में, विस्तृत वसुधा के कण-कण में, उन किरणों के अस्ताचल पर पहुँच लगा है सूर्य सँजोने! साथी, साँझ लगी अब होने!

अब कहाँ रस्म घर लुटाने की – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

अब कहाँ रस्म घर लुटाने की बर्कतें थी शराबख़ाने की कौन है जिससे गुफ़्तुगु कीजे जान देने की दिल लगाने की बात छेड़ी तो उठ गई महफ़िल उनसे जो बात थी बताने की

मेघदूत के प्रति – हरिवंशराय बच्चन

"मेघ" जिस जिस काल पढ़ता, मैं स्वयं बन मेघ जाता! हो धरणि चाहे शरद की चाँदनी में स्नान करती, वायु ऋतु हेमंत की चाहे गगन में हो विचरती,

औरत हुँ मैं – प्रिया आर्य “दीवानी’

नदी की गहराई में छुपी मिट्टी हुँ मैं जिस साँचे में डालो, ढल जाती हुँ मैं…..   आँशुयो की बेमौसम बरसात हुँ मैं दिल का दर्द सहने में पत्थर हुँ मैं…..

रंग है दिल का – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

तुम न आये थे तो हर चीज़ वहीं थी कि जो है आसमां हद्दे-नज़र, राहगुज़र राहगुज़र, शीशा-ए-मय शीशा-ए-मय  और अब शीशा-ए-मय, राहगुज़र, रंग-ए-फलक रंग है दिल का मेरे खूने-जिगर होने तक चम्पई रंग कभी, राहते-दीदार का रंग सुर्मई रंग की है साअते-बेज़ार का रंग

रात आधी, खींच कर मेरी हथेली – हरिवंशराय बच्चन

रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।  फ़ासला था कुछ हमारे बिस्तरों में और चारों ओर दुनिया सो रही थी, तारिकाएँ ही गगन की जानती हैं जो दशा दिल की तुम्हारे हो रही थी, मैं तुम्हारे पास होकर दूर तुमसे

दुनिया का इतिहास पूछता – अटल बिहारी वाजपेयी

दुनिया का इतिहास पूछता, रोम कहाँ, यूनान कहाँ? घर-घर में शुभ अग्नि जलाता। वह उन्नत ईरान कहाँ है? दीप बुझे पश्चिमी गगन के, व्याप्त हुआ बर्बर अंधियारा, किन्तु चीर कर तम की छाती,