कविता संग्रह

मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न माँग – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़शाँ[1] है हयात[2] तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर[3] का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम[4] में बहारों को सबात[5] तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है  तू जो मिल जाये तो तक़दीर निगूँ[6] हो जाये यूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाये और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा

मैं अखिल विश्व का गुरू महान – अटल बिहारी वाजपेयी

मैं अखिल विश्व का गुरू महान, देता विद्या का अमर दान, मैंने दिखलाया मुक्ति मार्ग मैंने सिखलाया ब्रह्म ज्ञान। मेरे वेदों का ज्ञान अमर, मेरे वेदों की ज्योति प्रखर

दिल के क़राइन- फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

वहीं हैं, दिल के क़राइन तमाम कहते हैं वो इक ख़लिश कि जिसे तेरा नाम कहते हैं  तुम आ रहे हो कि बजती हैं मेरी ज़ंजीरें न जाने क्या मेरे दीवारो-बाम कहते हैं  यही कनारे-फ़लक का सियहतरीं गोशा यही है मतलए-माहे-तमाम कहते हैं 

आ रही रवि की सवारी – हरिवंशराय बच्चन

आ रही रवि की सवारी। नव-किरण का रथ सजा है, कलि-कुसुम से पथ सजा है, बादलों-से अनुचरों ने स्‍वर्ण की पोशाक धारी। आ रही रवि की सवारी।

जो बरसों तक सड़े जेल में – अटल बिहारी वाजपेयी

जो बरसों तक सड़े जेल में, उनकी याद करें। जो फाँसी पर चढ़े खेल में, उनकी याद करें। याद करें काला पानी को, अंग्रेजों की मनमानी को, कोल्हू में जुट तेल पेरते, सावरकर से बलिदानी को। याद करें बहरे शासन को,

वफ़ा-ए-वा’दः नहीं – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

वफ़ा-ए-वा'दः नहीं, वा'दः-ए-दिगर भी नहीं वो मुझसे रूठे तो थे, लेकिन इस क़दर भी नहीं  बरस रही है हरीमे-हवस मे दौलते-हुस्न गदा-ए-इ'श्क़ के कासे मे इक नज़र भी नहीं 

राह कौन सी जाऊँ मैं ? – अटल बिहारी वाजपेयी

चौराहे पर लुटता चीर प्यादे से पिट गया वजीर चलूँ आखिरी चाल कि बाजी छोड़ विरक्ति सजाऊँ? राह कौन सी जाऊँ मैं? सपना जन्मा और मर गया मधु ऋतु में ही बाग झर गया तिनके टूटे हुये बटोरूँ या नवसृष्टि सजाऊँ मैं? राह कौन सी जाऊँ मैं?

तेरी सूरत – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

तेरी सूरत जो दिलनशीं की है आशना शक्ल हर हसीं की है  हुस्न से दिल लगा के हस्ती की हर घड़ी हमने आतशीं की है  सुबहे-गुल हो की शामे-मैख़ाना मदह उस रू-ए-नाज़नीं की है 

दो अनुभूतियाँ – अटल बिहारी वाजपेयी

गीत नहीं गाता हूँ बेनक़ाब चेहरे हैं, दाग़ बड़े गहरे हैं  टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूँ गीत नहीं गाता हूँ लगी कुछ ऐसी नज़र बिखरा शीशे सा शहर

सितम सिखलायेगा रस्मे-वफा – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

सितम सिखलायेगा रस्मे-वफा, ऐसे नहीं होता सनम दिखलायेंगे राहे-खुदा, ऐसे नहीं होता  गिनो सब हसरतें, जो खूं हुई हैं तन के मक़तल में मेरे क़ातिल हिसाबे-खूबहां, ऐसे नहीं होता