आज बाज़ार में पा-ब-जौला चलो चश्म-ए-नम जान-ए-शोरीदा काफी नहीं तोहमत-ए-इश्क़ पोशीदा काफी नहीं आज बाज़ार में पा-ब-जौला चलो दस्त-अफ्शां चलो, मस्त-ओ-रक़्सां चलो खाक-बर-सर चलो, खूं-ब-दामां चलो राह तकता है सब शहर-ए-जानां चलो
कविता संग्रह
पहचान में तेरे प्रिये – बिकाश पाण्डेय
तुम सदा वे ही रहे जो पास मेरे ना रहा, कभी यादों की हुक तो, कभी अनछुआ सपना रहा | कैसे कहूं की विह्वल हूँ आज फिर किस के लिए ? ये जन्म भी कट जाएगा पहचान में तेरे प्रिये..
जिंदगी – विकास कुमार
वक्त के पायदानों पर दुपाये खड़ी है जिंदगी रेत के मानिंद हथेली से फिसलती जिंदगी जागकर नहाई धोई और चल पड़ी है जिंदगी उबड़ खाबड़ रास्ते औऱ सड़कों पर दौड़ती जिंदगी
चिडिया और चुरूंगुन – हरिवंशराय बच्चन
छोड़ घोंसला बाहर आया, देखी डालें, देखे पात, और सुनी जो पत्ते हिलमिल, करते हैं आपस में बात;- माँ, क्या मुझको उड़ना आया? 'नहीं, चुरूगुन, तू भरमाया'
निसार मैं तेरी गलियों के अए वतन – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’
निसार मैं तेरी गलियों के अए वतन, कि जहाँ चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले जो कोई चाहनेवाला तवाफ़ को निकले नज़र चुरा के चले, जिस्म-ओ-जाँ बचा के चले
हम बे-शहर बे-सहर ही सही – विकाश कुमार
हम बे-शहर बे-सहर ही सही, ज़िंदगी हमारी दोपहर ही सही दिल में वफ़ा का गुमान तो है, वैसे सफ़र बे-हमसफ़र ही सही
तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’
तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं हदीस-ए-यार के उनवाँ निखरने लगते हैं तो हर हरीम में गेसू सँवरने लगते हैं हर अजनबी हमें महरम दिखाई देता है जो अब भी तेरी गली गली से गुज़रने लगते हैं
लहर सागर का नहीं श्रृंगार – हरिवंशराय बच्चन
लहर सागर का नहीं श्रृंगार, उसकी विकलता है; अनिल अम्बर का नहीं खिलवार उसकी विकलता है; विविध रूपों में हुआ साकार, रंगो में सुरंजित, मृत्तिका का यह नहीं संसार, उसकी विकलता है।
ढाका से वापसी पर – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’
हम केः ठहरे अजनबी इतनी मदारातों[1] के बाद फिर बनेंगे आशना[2] कितनी मुलाक़ातों के बाद कब नज़र में आयेगी बे-दाग़ सब्ज़े की बहार ख़ून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद
ख़ुर्शीद-ए-महशर की लौ – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’
आज के दिन न पूछो मेरे दोस्तो दूर कितने हैं ख़ुशियाँ मनाने के दिन खुल के हँसने के दिन गीत गाने के दिन प्यार करने के दिन दिल लगाने के दिन





