कुछ छोटे सपनो के बदले, बड़ी नींद का सौदा करने, निकल पडे हैं पांव अभागे,जाने कौन डगर ठहरेंगे ! वही प्यास के अनगढ़ मोती, वही धूप की सुर्ख कहानी, वही आंख में घुटकर मरती, आंसू की खुद्दार जवानी, हर मोहरे की मूक विवशता,चौसर के खाने क्या जाने हार जीत तय करती है वे, आज कौन से घर ठहरेंगे निकल पडे हैं पांव अभागे,जाने कौन डगर ठहरेंगे ! कुछ पलकों में बंद चांदनी,
कविता संग्रह
प्रतीक्षा – हरिवंशराय बच्चन
मधुर प्रतीक्षा ही जब इतनी प्रिय तुम आते तब क्या होता? मौन रात इस भान्ति कि जैसे, कोइ गत वीणा पर बज कर अभी अभी सोयी खोयी सी, सपनो में तारों पर सिर धर और दिशाओं से प्रतिध्वनियां जाग्रत सुधियों सी आती हैं कान तुम्हारी तान कहीं से यदि सुन पाते, तब क्या होता?
साजन आए, सावन आया – हरिवंशराय बच्चन
अब दिन बदले, घड़ियाँ बदलीं, साजन आए, सावन आया। धरती की जलती साँसों ने मेरी साँसों में ताप भरा, सरसी की छाती दरकी तो कर घाव गई मुझपर गहरा,
यादे-ग़ज़ालचश्मां – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’
यादे-ग़ज़ालचश्मां, ज़िक्रे-समनइज़ारां जब चाहा कर लिया है कुंजे-क़फ़स बहारां आंखों में दर्दमंदी, होंठों पे उज़्रख़्वाही जानाना-वार आई शामे-फ़िराक़े-यारां
वो अहदे-ग़म – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’
वो अहदे-ग़म की काहिशहा-ए-बेहासिल को क्या समझे जो उनकी मुख़्त्सर रूदाद भी सब्र-आज़मा समझे यहां वाबस्तगी, वां बरहमी, क्या जानिये क्यों है न हम अपनी नज़र समझे, न हम उनकी अदा समझे
बहार आई – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’
बहार आई तो जैसे एक बार लौट आये हैं फिर अदम से वो ख़्वाब सारे, शबाब सारे जो तेरे होंठों पे मर मिटे थे जो मिट के हर बार फिर जीये थे निखर गये हैं गुलाब सारे जो तेरी यादों से मुश्कबू हैं
तेरे ग़म को जाँ की तलाश थी – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’
तेरे ग़म को जाँ की तलाश थी तेरे जाँ-निसार चले गये तेरी राह में करते थे सर तलब सर-ए-राह-गुज़ार चले गये तेरी कज़ -अदाई से हार के शब-ए-इंतज़ार चली गई मेरे ज़ब्त-ए-हाल से रूठ कर मेरे ग़म-गुसार चले गये
राष्ट्रिय ध्वज – हरिवंशराय बच्चन
नागाधिराज श्रृंग पर खडी हुई, समुद्र की तरंग पर अडी हुई, स्वदेश में जगह-जगह गडी हुई, अटल ध्वजा हरी,सफेद केसरी!
रक़ीब से – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’
आ, के वाबस्तः हैं उस हुस्न की यादें तुझ से जिसने इस दिल को परीखानः बना रखा था जिसकी उल्फ़त में भुला रखी थी दुनिया हमने दह्र को दह्र का अफ़साना बना रखा था आशना हैं तेरे क़दमों से वो राहें जिन पर उसकी मदहोश जवानी ने इ’नायत की है कारवाँ गुज़रे हैं जिनसे उसी रा'नाई के जिसकी इन आँखों ने बे-सूद इ’बादत की है
पतझड़ की शाम – हरिवंशराय बच्चन
है यह पतझड़ की शाम, सखे ! नीलम-से पल्लव टूट गए, मरकत-से साथी छूट गए, अटके फिर भी दो पीत पात जीवन-डाली को थाम, सखे ! है यह पतझड़ की शाम, सखे !




