कविता संग्रह

रूह जिस्म का ठौर ठिकाना – कुमार विश्वास

रूह जिस्म का ठौर ठिकाना चलता रहता है जीना मरना खोना पाना चलता रहता है सुख दुख वाली चादर घटती वढती रहती है मौला तेरा ताना वाना चलता रहता है इश्क करो तो जीते जी मर जाना पड़ता है मर कर भी लेकिन जुर्माना चलता रहता है

क़दम बढाने वाले – हरिवंशराय बच्चन

अगर तुम्हारा मुकाबला दीवार से है, पहाड़ से है, खाई-खंदक से, झाड़-झंकाड़ से है तो दो ही रास्ते हैं- दीवार को गिराओ,

धूप सा तन दीप सी मैं!  – महादेवी वर्मा

उड़ रहा नित एक सौरभ-धूम-लेखा में बिखर तन, खो रहा निज को अथक आलोक-सांसों में पिघल मन अश्रु से गीला सृजन-पल, औ' विसर्जन पुलक-उज्ज्वल, आ रही अविराम मिट मिट स्वजन ओर समीप सी मैं!

रंग दुनिया ने दिखाया है – कुमार विश्वास

रंग दुनिया ने दिखाया है निराला, देखूँ है अँधेरे में उजाला, तो उजाला देखूँ  आइना रख दे मेरे हाथ में, आख़िर मैं भी कैसा लगता है तेरा चाहने वाला देखूँ जिसके आँगन से खुले थे मेरे सारे रस्ते उस हवेली पे भला कैसे मैं ताला देखूँ

मौन और शब्द – हरिवंशराय बच्चन

एक दिन मैंने मैन में शब्द को धँसाया था और एक गहरी पीड़ा, एक गहरे आनंद में, सन्निपात-ग्रस्त सा, विवश कुछ बोला था; सुना, मेरा वह बोलना दुनियाँ में काव्य कहलाया था।

अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी? – महादेवी वर्मा

आँधी आई जोर शोर से, डालें टूटी हैं झकोर से। उड़ा घोंसला अंडे फूटे, किससे दुख की बात कहेगी! अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी?

ये इतने लोग कहाँ जाते हैं सुबह-सुबह? – कुमार विश्वास

ये इतने लोग कहाँ जाते हैं सुबह-सुबह? ढेर सी चमक-चहक चेहरे पे लटकाए हुए हंसी को बेचकर बेमोल वक़्त के हाथों शाम तक उन ही थक़ानो में लौटने के लिए ये इतने लोग कहाँ जाते हैं सुबह-सुबह?

स्वप्न से किसने जगाया – महादेवी वर्मा

स्वप्न से किसने जगाया? मैं सुरभि हूं।  छोड कोमल फूल का घर, ढूंढती हूं निर्झर। पूछती हूं नभ धरा से- क्या नहीं र्त्रतुराज आया?

गर्म लोहा – हरिवंशराय बच्चन

गर्म लोहा पीट, ठंडा पीटने को वक्त बहुतेरा पड़ा है। सख्त पंजा, नस कसी चौड़ी कलाई और बल्लेदार बाहें, और आँखें लाल चिंगारी सरीखी, चुस्त औ तीखी निगाहें, हाँथ में घन, और दो लोहे निहाई पर धरे तू देखता क्या? गर्म लोहा पीट, ठंडा पीटने को वक्त बहुते

मौसम के गाँव – कुमार विश्वास

बहुत देर से सोकर जागी दिशा-वधू मौसम के गाँव अतः डरी लज्जित-सी पहुँची छूने दिवस-पिया के पाँव! आँखों वाली क्षितिज-रेख पर काला-सूरज उदित हुआ धरती का कर निज दुहिता के पाँव परस कर मुदित हुआ