कैदी और कोकिला – माखनलाल चतुर्वेदी

क्या गाती हो? क्यों रह-रह जाती हो? कोकिल बोलो तो! क्या लाती हो? सन्देशा किसका है? कोकिल बोलो तो!

सेवा-2 – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

जो मिठाई में सुधा से है अधिक। खा सके वह रस भरा मेवा नहीं। तो भला जग में जिये तो क्या जिये। की गयी जो जाति की सेवा नहीं।1।

पूसी बिल्ली – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

पूसी बिल्ली, पूसी बिल्ली कहाँ गई थी? राजधानी देखने मैं दिल्ली गई थी!

बेघर – जावेद अख़्तर

शाम होने को है लाल सूरज समंदर में खोने को है और उसके परे  कुछ परिन्‍दे  क़तारें बनाए उन्‍हीं जंगलों को चले

मैं अपने से डरती हूँ सखि – माखनलाल चतुर्वेदी

मैं अपने से डरती हूँ सखि ! पल पर पल चढ़ते जाते हैं, पद-आहट बिन, रो! चुपचाप बिना बुलाये आते हैं दिन, मास, वरस ये अपने-आप; लोग कहें चढ़ चली उमर में पर मैं नित्य उतरती हूँ सखि ! मैं अपने से डरती हूँ सखि !

सेवा – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

देख पड़ी अनुराग-राग-रंजित रवितन में। छबि पाई भर विपुल-विभा नीलाभ-गगन में। बर-आभा कर दान ककुभ को दुति से दमकी। अन्तरिक्ष को चारु ज्योतिमयता दे चमकी। कर संक्रान्ति गिरि-सानु-सकल को कान्त दिखाई।

चल मेरी ढोलकी – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

चल मेरी ढोलकी ढमाक-ढम, नानी के घर जाते हम। चल मेरी ढोलकी ढमाक-ढम नहीं रुकेंगे कहीं भी हम!

बहाना ढूँढते रहते हैं  – जावेद अख़्तर

बहाना ढूँढते रहते हैं कोई रोने का हमें ये शौक़ है क्या आस्तीं भिगोने का अगर पलक पे है मोती तो ये नहीं काफ़ी हुनर भी चाहिए अल्फ़ाज़ में पिरोने का

दीप से दीप जले – माखनलाल चतुर्वेदी

सुलग-सुलग री जोत दीप से दीप मिलें कर-कंकण बज उठे, भूमि पर प्राण फलें। लक्ष्मी खेतों फली अटल वीराने में लक्ष्मी बँट-बँट बढ़ती आने-जाने में लक्ष्मी का आगमन अँधेरी रातों में लक्ष्मी श्रम के साथ घात-प्रतिघातों में लक्ष्मी सर्जन हुआ कमल के फूलों में लक्ष्मी-पूजन सजे नवीन दुकूलों में।।

समझ का फेर – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

है भरी कूट कूट कोर कसर। माँ बहन से करें न क्यों कुट्टी। लोग सहयोग कर सकें कैसे। है असहयोग से नहीं छुट्टी।1।