एकांत-संगीत – हरिवंशराय बच्चन

तट पर है तरुवर एकाकी, नौका है, सागर में, अंतरिक्ष में खग एकाकी, तारा है, अंबर में, भू पर वन, वारिधि पर बेड़े, नभ में उडु खग मेला, नर नारी से भरे जगत में कवि का हृदय अकेला!

जब भी मुँह ढक लेता हूँ – कुमार विश्वास

जब भी मुँह ढक लेता हूँ तेरे जुल्फों के छाँव में कितने गीत उतर आते है मेरे मन के गाँव में एक गीत पलकों पर लिखना एक गीत होंठो पर लिखना यानि सारी गीत हृदय की मीठी-सी चोटों पर लिखना जैसे चुभ जाता है कोई काँटा नँगे पाँव में ऐसे गीत उतर आते हैं, मेरे मन के गाँव में

शहीद की माँ – हरिवंशराय बच्चन

इसी घर से एक दिन शहीद का जनाज़ा निकला था, तिरंगे में लिपटा, हज़ारों की भीड़ में। काँधा देने की होड़ में सैकड़ो के कुर्ते फटे थे, पुट्ठे छिले थे।

बहुत दिनों पर – हरिवंशराय बच्चन

मैं तो बहुत दिनों पर चेता । श्रम कर ऊबा श्रम कण डूबा सागर को खेना था मुझको रहा शिखर को खेता मैं तो बहुत दिनों पर चेता ।

खुद को आसान कर रही हो ना – कुमार विश्वास

खुद को आसान कर रही हो ना हम पे एहसान कर रही हो ना ज़िन्दगी हसरतों की मय्यत है फिर भी अरमान कर रही हो ना

आत्मदीप – हरिवंशराय बच्चन

मुझे न अपने से कुछ प्यार, मिट्टी का हूँ, छोटा दीपक, ज्योति चाहती, दुनिया जब तक, मेरी, जल-जल कर मैं उसको देने को तैयार पर यदि मेरी लौ के द्वार, दुनिया की आँखों को निद्रित, चकाचौध करते हों छिद्रित मुझे बुझा दे बुझ जाने से मुझे नहीं इंकार

चिड़िया – हरिवंशराय बच्चन

मैनें चिड़िया से कहा, मैं तुम पर एक  कविता लिखना चाहता हूँ। चिड़िया नें मुझ से पूछा, 'तुम्हारे शब्दों में मेरे परों की रंगीनी है?' मैंने कहा, 'नहीं'। 'तुम्हारे शब्दों में मेरे कंठ का संगीत है?' 'नहीं।' 'तुम्हारे शब्दों में मेरे डैने की उड़ान है?' 'नहीं।' 'जान है?' 'नहीं।' 'तब तुम मुझ पर कविता क्या लिखोगे?' मैनें कहा, 'पर तुमसे मुझे प्यार है' चिड़िया बोली, 'प्यार का शब्दों से क्या सरोकार है?' एक अनुभव हुआ नया। मैं मौन हो गया!

उनकी ख़ैरो-ख़बर नहीं मिलती – कुमार विश्वास

उनकी ख़ैरो-ख़बर नहीं मिलती हमको ही ख़ासकर नहीं मिलती शायरी को नज़र नहीं मिलती मुझको तू ही अगर नहीं मिलती

बजी कहीं शहनाई सारी रात – रमानाथ अवस्थी

सो न सका कल याद तुम्हारी आई सारी रात और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात मेरे बहुत चाहने पर भी नींद न मुझ तक आई ज़हर भरी जादूगरनी-सी मुझको लगी जुन्हाई मेरा मस्तक सहला कर बोली मुझसे पुरवाई दूर कहीं दो आँखें भर-भर आई सारी रात और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात

आदर्श प्रेम – हरिवंशराय बच्चन

प्यार किसी को करना लेकिन कह कर उसे बताना क्या अपने को अर्पण करना पर और को अपनाना क्या गुण का ग्राहक बनना लेकिन गा कर उसे सुनाना क्या मन के कल्पित भावों से औरों को भ्रम में लाना क्या