आँधी आई जोर शोर से, डालें टूटी हैं झकोर से। उड़ा घोंसला अंडे फूटे, किससे दुख की बात कहेगी! अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी?
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ये इतने लोग कहाँ जाते हैं सुबह-सुबह? – कुमार विश्वास
ये इतने लोग कहाँ जाते हैं सुबह-सुबह? ढेर सी चमक-चहक चेहरे पे लटकाए हुए हंसी को बेचकर बेमोल वक़्त के हाथों शाम तक उन ही थक़ानो में लौटने के लिए ये इतने लोग कहाँ जाते हैं सुबह-सुबह?
स्वप्न से किसने जगाया – महादेवी वर्मा
स्वप्न से किसने जगाया? मैं सुरभि हूं। छोड कोमल फूल का घर, ढूंढती हूं निर्झर। पूछती हूं नभ धरा से- क्या नहीं र्त्रतुराज आया?
गर्म लोहा – हरिवंशराय बच्चन
गर्म लोहा पीट, ठंडा पीटने को वक्त बहुतेरा पड़ा है। सख्त पंजा, नस कसी चौड़ी कलाई और बल्लेदार बाहें, और आँखें लाल चिंगारी सरीखी, चुस्त औ तीखी निगाहें, हाँथ में घन, और दो लोहे निहाई पर धरे तू देखता क्या? गर्म लोहा पीट, ठंडा पीटने को वक्त बहुते
मौसम के गाँव – कुमार विश्वास
बहुत देर से सोकर जागी दिशा-वधू मौसम के गाँव अतः डरी लज्जित-सी पहुँची छूने दिवस-पिया के पाँव! आँखों वाली क्षितिज-रेख पर काला-सूरज उदित हुआ धरती का कर निज दुहिता के पाँव परस कर मुदित हुआ
आज मुझसे बोल, बादल – हरिवंशराय बच्चन
आज मुझसे बोल, बादल! तम भरा तू, तम भरा मैं, ग़म भरा तू, ग़म भरा मैं, आज तू अपने हृदय से हृदय मेरा तोल, बादल आज मुझसे बोल, बादल!
अश्रु यह पानी नहीं है – महादेवी वर्मा
अश्रु यह पानी नहीं है, यह व्यथा चंदन नहीं है! यह न समझो देव पूजा के सजीले उपकरण ये, यह न मानो अमरता से माँगने आए शरण ये, स्वाति को खोजा नहीं है औ' न सीपी को पुकारा, मेघ से माँगा न जल, इनको न भाया सिंधु खारा! शुभ्र मानस से छलक आए तरल ये ज्वाल मोती, प्राण की निधियाँ अमोलक बेचने का धन नहीं है।
मैं तो झोंका हूँ – कुमार विश्वास
मैं तो झोंका हूँ हवाओं का उड़ा ले जाऊँगा जागती रहना, तुझे तुझसे चुरा ले जाऊँगा हो के क़दमों पर निछावर फूल ने बुत से कहा ख़ाक में मिल कर भी मैं ख़ुश्बू बचा ले जाऊँगा कौन-सी शै तुझको पहुँचाएगी तेरे शहर तक ये पता तो तब चलेगा जब पता ले जाऊँगा
युग की उदासी – हरिवंशराय बच्चन
अकारण ही मैं नहीं उदास अपने में ही सिकुड सिमट कर जी लेने का बीता अवसर जब अपना सुख दुख था, अपना ही उछाह उच्छ्वास अकारण ही मैं नहीं उदा
प्रिय चिरंतन है सजनि – महादेवी वर्मा
प्रिय चिरंतन है सजनि, क्षण-क्षण नवीन सुहासिनी मै! श्वास में मुझको छिपाकर वह असीम विशाल चिर घन शून्य में जब छा गया उसकी सजीली साध-सा बन, छिप कहाँ उसमें सकी बुझ-बुझ जली चल दामिनी मैं।



