इब्तिदा-ऐ-इश्क है रोता है क्या – मीर तकी “मीर”

इब्तिदा-ऐ-इश्क है रोता है क्या आगे आगे देखिये होता है क्या

बेखुदी कहाँ ले गई हमको – मीर तकी “मीर”

बेखुदी कहाँ ले गई हमको, देर से इंतज़ार है अपना

फ़क़ीराना आए सदा कर चले – मीर तकी “मीर”

फ़क़ीराना आए सदा कर चले मियाँ खुश रहो हम दुआ कर चले

हस्ती अपनी हुबाब की सी है – मीर तकी “मीर”

हस्ती अपनी हुबाब की सी है । ये नुमाइश सराब की सी है ।। 

अपने तड़पने की मैं तदबीर पहले कर लूँ – मीर तकी “मीर”

अपने तड़पने की मैं तदबीर पहले कर लूँ तब फ़िक्र मैं करूँगा ज़ख़्मों को भी रफू का।

बेखुदी ले गयी – मीर तकी “मीर”

बेखुदी ले गयी कहाँ हम को देर से इंतज़ार है अपना रोते फिरते हैं सारी-सारी रात अब यही रोज़गार है अपना

पूरा दिन – गुलज़ार

मुझे खर्ची में पूरा एक दिन, हर रोज़ मिलता है मगर हर रोज़ कोई छीन लेता है, झपट लेता है, अंटी से कभी खीसे से गिर पड़ता है तो गिरने की आहट भी नहीं होती,

ये न थी हमारी क़िस्मत – मिर्ज़ा ग़ालिब

ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता   तेरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूट जाना कि ख़ुशी से मर न जाते अगर एतबार होता

कोहरे के खेत – कैफ़ि आज़मी

वो सर्द रात जबकि सफ़र कर रहा था मैं रंगीनियों से जर्फ़-ए-नज़र भर रहा था मैं

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी – मिर्ज़ा ग़ालिब

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी के हर ख़्वाहिश पे दम निकले बहुत निकले मेरे अरमाँ लेकिन फिर भी कम निकले निकलना खुळ से आदम का सुनते आये हैं लेकिन बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले