दुआ करो जल सके दिया हो उजाला रोशन हो हर कोना
दुआ करो – विकास कुमार (अतिथि लेखक)
दुआ करो जल सके दिया हो उजाला रोशन हो हर कोना
दुआ करो जल सके दिया हो उजाला रोशन हो हर कोना
आज कल दुनिया में कुछ ऐसा उठ रहा है तूफ़ान, की बात बात पर "हक़" मांग बैठता है हर इंसान।
तुम अधूरे मैं अधूरा दिन अधूरे रात अधूरी भावनाएँ जो बह रहीं हैं उठ रहीं तरंग अधूरी
तुम अधूरे मैं अधूरा दिन अधूरे रात अधूरी भावनाएँ जो बह रहीं हैं उठ रहीं तरंग अधूरी
ये जो बतियाँ जग रही है राहों पर ये रौशनी दे रही है या अँधेरा मुझे नहीं पता
उस दिन जाने से पहले वो कुछ कहना चाहती थी पर मैं उसकी बोलती आँखों को सुन ही नहीं पाया
लव बींस (love beans) तनहा सा रहता था मैं इस तनहा शहर में, कभी खुद से छिपता , कभी खुद से मिलता था। अक्सर देर से सोता था , देर से उठता था। न जाने कितने बरस हो गए थे मुझ जैसे आलसी को सुबह सवेरे की दुनिया देखे सुने । आज बैठा हूँ हाथ में कॉफ़ी (coffee-) का … Continue reading मैं और मेरी कॉफ़ी (कहानी) – कुमार शान्तनु