मैं कवी हूँ – विकास कुमार

मैं कवी हूँ मैं तुमको हमेशा ताली बजाने के लिए नहीं कहूंगा, और ना ही मैं तुमको हसाऊंगा । ना ही कविता का काफिया मिलाऊँगा । आज में बस शब्दों को एकता की माला में   पिरोऊंगा , आज जो तुम्हारे कृत्य  हैं उसमें हास्य कहाँ उसमें ताली बजाने की गुंजाइश  कहाँ ,

चीज़ों की क़ीमत – प्रिया आर्य “दीवानी’

चीजो की कीमत नहीं होती वक़्त उनकी कीमत तय करता  है। गमो का खजाना है ,मेरे पास देखे कितने दाम में अब ये बिकता है। इस दौर में ख़रीदलो तुम मुझको भी पर जो है ही नहीं , देखें हम भी कैसे बिकता है।

 इंतज़ार – रुचिका मान ‘रूह’ (अतिथि लेखक)

क्या लौट आना चाहते हो? इस ख़याल से कि ठहरी हुई सी रूह मिलेगी सब बिसरा कर वहीं जमी हुई अविरल , अचल, अभंग- नभमंडल बन.... दृढ़, स्थिर, अक्षीण-  तुम्हारी बाट में?

लड़ते देखता हूं – राज़िक अंसारी

मैं जब रिश्तों को लड़ते देखता हूं हवेली को उजड़ते देखता हूँ न जाने क्यों मुझे लगता है , मैं हूँ किसी को जब बिछड़ते देखता हूँ

दिल – राज़िक अंसारी

एक नन्हा मुन्ना बच्चा यही कोई 8-10 साल का फटा हुआ लिबास या यूं कहो पहनने के नाम पर बस चिथड़ा खींचता जा रहा है एक गाड़ी, बिना इंजन की, सही समझे-छकड़ा

बजट – विकास कुमार

एक नन्हा मुन्ना बच्चा यही कोई 8-10 साल का फटा हुआ लिबास या यूं कहो पहनने के नाम पर बस चिथड़ा खींचता जा रहा है एक गाड़ी, बिना इंजन की, सही समझे-छकड़ा

 प्रवाह – रुचिका मान ‘रूह’ (अतिथि लेखक)

एक दिन इस्पात के पंखों पर सवार हो एक आवारा झोंका बह निकला- चटक मन-मोदकों से सामंजस्य बनाने |

अन्धा कौन ? – विकास कुमार

पार्लियामेंट स्ट्रीट का वो मंजर सीने मेँ घोँपता जैसे एक  खंजर, हर एक था जैसे वहाँ बैरिस्टर पर दिलोँ मेँ कहाँ था उनके मानवता का वो फैक्टर , तभी अचानक गुजरी वहाँ से एक वृध्धा, हाथ मेँ था जिसके लकडी का एक डंडा,

उस रात तुम आई थीं प्रिये – विकास कुमार (अतिथि लेखक)

जब घड़ी की टक टक सुनाई दे रही थी घोर तम के शुनशान अंधेरे में जुगनू उस रात के तम से लड़ रहे थे और अपनी जीत का जश्न मना रहे थे उस रात तुम आई थीं प्रिये

तुम मत भूलना उनको – विकास कुमार (अतिथि लेखक)

तुम मत भूलना उनको, वतन पर फक्र था , जिनको मिलाकर धूल में उनको, लगाकर माटी का चंदन,