आत्‍मपरिचय – हरिवंशराय बच्चन

मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ, फिर भी जीवन में प्‍यार लिए फिरता हूँ; कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकर मैं सासों के दो तार लिए फिरता हूँ!

ऐसे मैं मन बहलाता हूँ – हरिवंशराय बच्चन

सोचा करता बैठ अकेले, गत जीवन के सुख-दुख झेले, दंशनकारी सुधियों से मैं उर के छाले सहलाता हूँ! ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!

क्षण भर को क्यों प्यार किया था? – हरिवंशराय बच्चन

अर्द्ध रात्रि में सहसा उठकर, पलक संपुटों में मदिरा भर तुमने क्यों मेरे चरणों में अपना तन-मन वार दिया था? क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

पड़ोसी से – अटल बिहारी वाजपेयी

एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते, पर स्वतन्त्र भारत का मस्तक नहीं झुकेगा। अगणित बलिदानो से अर्जित यह स्वतन्त्रता, अश्रु स्वेद शोणित से सिंचित यह स्वतन्त्रता। त्याग तेज तपबल से रक्षित यह स्वतन्त्रता, दु:खी मनुजता के हित अर्पित यह स्वतन्त्रता।

लो दिन बीता लो रात गयी – हरिवंशराय बच्चन

सूरज ढल कर पच्छिम पंहुचा, डूबा, संध्या आई, छाई, सौ संध्या सी वह संध्या थी, क्यों उठते-उठते सोचा था दिन में होगी कुछ बात नई लो दिन बीता, लो रात गई

 प्रवाह – रुचिका मान ‘रूह’ (अतिथि लेखक)

एक दिन इस्पात के पंखों पर सवार हो एक आवारा झोंका बह निकला- चटक मन-मोदकों से सामंजस्य बनाने |

क्या है मेरी बारी में – हरिवंशराय बच्चन

जिसे सींचना था मधुजल से सींचा खारे पानी से, नहीं उपजता कुछ भी ऐसी विधि से जीवन-क्यारी में। क्या है मेरी बारी में।

अंतरद्वंद्व – अटल बिहारी वाजपेयी

क्या सच है, क्या शिव, क्या सुंदर? शव का अर्चन, शिव का वर्जन, कहूँ विसंगति या रूपांतर?

कोई पार नदी के गाता – हरिवंशराय बच्चन

भंग निशा की नीरवता कर, इस देहाती गाने का स्वर, ककड़ी के खेतों से उठकर,  आता जमुना पर लहराता! कोई पार नदी के गाता!

अन्धा कौन ? – विकास कुमार

पार्लियामेंट स्ट्रीट का वो मंजर सीने मेँ घोँपता जैसे एक  खंजर, हर एक था जैसे वहाँ बैरिस्टर पर दिलोँ मेँ कहाँ था उनके मानवता का वो फैक्टर , तभी अचानक गुजरी वहाँ से एक वृध्धा, हाथ मेँ था जिसके लकडी का एक डंडा,