अब ये किसने कहा हम बोलते नहीं सहाब तुम प्यार तो करो हम बोलेंगे भी, तोड़ेंगे भी समाज को भी, कौमी एकता को भी और हड्डियों को भी तुम नहीं जानते हमारी भावनाएं
Category: हिंदी कविताएँ
मैं कवी हूँ – विकास कुमार
मैं कवी हूँ मैं तुमको हमेशा ताली बजाने के लिए नहीं कहूंगा, और ना ही मैं तुमको हसाऊंगा । ना ही कविता का काफिया मिलाऊँगा । आज में बस शब्दों को एकता की माला में पिरोऊंगा , आज जो तुम्हारे कृत्य हैं उसमें हास्य कहाँ उसमें ताली बजाने की गुंजाइश कहाँ ,
चीज़ों की क़ीमत – प्रिया आर्य “दीवानी’
चीजो की कीमत नहीं होती वक़्त उनकी कीमत तय करता है। गमो का खजाना है ,मेरे पास देखे कितने दाम में अब ये बिकता है। इस दौर में ख़रीदलो तुम मुझको भी पर जो है ही नहीं , देखें हम भी कैसे बिकता है।
इंतज़ार – रुचिका मान ‘रूह’ (अतिथि लेखक)
क्या लौट आना चाहते हो? इस ख़याल से कि ठहरी हुई सी रूह मिलेगी सब बिसरा कर वहीं जमी हुई अविरल , अचल, अभंग- नभमंडल बन.... दृढ़, स्थिर, अक्षीण- तुम्हारी बाट में?
तुम तूफान समझ पाओगे – हरिवंशराय बच्चन
गीले बादल, पीले रजकण, सूखे पत्ते, रूखे तृण घन लेकर चलता करता 'हरहर'--इसका गान समझ पाओगे? तुम तूफान समझ पाओगे?
स्वप्न था मेरा भयंकर – हरिवंशराय बच्चन
रात का-सा था अंधेरा, बादलों का था न डेरा, किन्तु फिर भी चन्द्र-तारों से हुआ था हीन अम्बर! स्वप्न था मेरा भयंकर!
इतने मत उन्मत्त बनो – हरिवंशराय बच्चन
जीवन मधुशाला से मधु पी बनकर तन-मन-मतवाला, गीत सुनाने लगा झुमकर चुम-चुमकर मैं प्याला- शीश हिलाकर दुनिया बोली, पृथ्वी पर हो चुका बहुत यह, इतने मत उन्मत्त बनो। इतने मत संतप्त बनो।
त्राहि त्राहि कर उठता जीवन – हरिवंशराय बच्चन
जब रजनी के सूने क्षण में, तन-मन के एकाकीपन में कवि अपनी विव्हल वाणी से अपना व्याकुल मन बहलाता, त्राहि, त्राहि कर उठता जीवन!
मैं कल रात नहीं रोया था – हरिवंशराय बच्चन
दुख सब जीवन के विस्मृत कर, तेरे वक्षस्थल पर सिर धर, तेरी गोदी में चिड़िया के बच्चे-सा छिपकर सोया था! मैं कल रात नहीं रोया था!
बजट – विकास कुमार
एक नन्हा मुन्ना बच्चा यही कोई 8-10 साल का फटा हुआ लिबास या यूं कहो पहनने के नाम पर बस चिथड़ा खींचता जा रहा है एक गाड़ी, बिना इंजन की, सही समझे-छकड़ा








