हार गया – कुमार विश्वास

हार गया तन-मन पुकार कर तुम्हें कितने एकाकी हैं प्यार कर तुम्हें जिस पल हल्दी लेपी होगी तन पर माँ ने जिस पल सखियों ने सौंपी होंगीं सौगातें ढोलक की थापों में, घुँघरू की रुनझुन में घुल कर फैली होंगीं घर में प्यारी बातें

मै अनंत पथ में लिखती जो – महादेवी वर्मा

मै अनंत पथ में लिखती जो सस्मित सपनों की बाते उनको कभी न धो पायेंगी अपने आँसू से रातें! उड़् उड़ कर जो धूल करेगी मेघों का नभ में अभिषेक अमिट रहेगी उसके अंचल- में मेरी पीड़ा की रेख!

सफ़ाई मत देना! – कुमार विश्वास

एक शर्त पर मुझे निमन्त्रण है मधुरे स्वीकार सफ़ाई मत देना! अगर करो झूठा ही चाहे, करना दो पल प्यार सफ़ाई मत देना

दो पीढियाँ – हरिवंशराय बच्चन

मुंशी जी तन्नाए पर जब उनसे कहा गया, ऎसा जुल्म और भी सह चुके हैं तो चले गए दुम दबाए। मुंशी जी के लड़के तन्नाए, पर जब उनसे कहा गया, ऎसा ज़ुल्म औरों पर भी हुआ है तो वे और भी तन्नाए।

मेरा सजल मुख देख लेते! – महादेवी वर्मा

मेरा सजल मुख देख लेते! यह करुण मुख देख लेता! सेतु शूलों का बना बाँधा विरह-वारीश का जल फूल की पलकें बनाकर प्यालियाँ बाँटा हलाहल!

रूह जिस्म का ठौर ठिकाना – कुमार विश्वास

रूह जिस्म का ठौर ठिकाना चलता रहता है जीना मरना खोना पाना चलता रहता है सुख दुख वाली चादर घटती वढती रहती है मौला तेरा ताना वाना चलता रहता है इश्क करो तो जीते जी मर जाना पड़ता है मर कर भी लेकिन जुर्माना चलता रहता है

क़दम बढाने वाले – हरिवंशराय बच्चन

अगर तुम्हारा मुकाबला दीवार से है, पहाड़ से है, खाई-खंदक से, झाड़-झंकाड़ से है तो दो ही रास्ते हैं- दीवार को गिराओ,

धूप सा तन दीप सी मैं!  – महादेवी वर्मा

उड़ रहा नित एक सौरभ-धूम-लेखा में बिखर तन, खो रहा निज को अथक आलोक-सांसों में पिघल मन अश्रु से गीला सृजन-पल, औ' विसर्जन पुलक-उज्ज्वल, आ रही अविराम मिट मिट स्वजन ओर समीप सी मैं!

रंग दुनिया ने दिखाया है – कुमार विश्वास

रंग दुनिया ने दिखाया है निराला, देखूँ है अँधेरे में उजाला, तो उजाला देखूँ  आइना रख दे मेरे हाथ में, आख़िर मैं भी कैसा लगता है तेरा चाहने वाला देखूँ जिसके आँगन से खुले थे मेरे सारे रस्ते उस हवेली पे भला कैसे मैं ताला देखूँ

मौन और शब्द – हरिवंशराय बच्चन

एक दिन मैंने मैन में शब्द को धँसाया था और एक गहरी पीड़ा, एक गहरे आनंद में, सन्निपात-ग्रस्त सा, विवश कुछ बोला था; सुना, मेरा वह बोलना दुनियाँ में काव्य कहलाया था।