एक पत्र – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

मैं चरणॊं से लिपट रहा था, सिर से मुझे लगाया क्यों? पूजा का साहित्य पुजारी पर इस भाँति चढ़ाया क्यों? गंधहीन बन-कुसुम-स्तुति में अलि का आज गान कैसा? मन्दिर-पथ पर बिछी धूलि की पूजा का विधान कैसा?

परदेशी – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

माया के मोहक वन की क्या कहूँ कहानी परदेशी? भय है, सुन कर हँस दोगे मेरी नादानी परदेशी! सृजन-बीच संहार छिपा, कैसे बतलाऊं परदेशी? सरल कंठ से विषम राग मैं कैसे गाऊँ परदेशी?

कुंजी – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

घेरे था मुझे तुम्हारी साँसों का पवन, जब मैं बालक अबोध अनजान था। यह पवन तुम्हारी साँस का सौरभ लाता था। उसके कंधों पर चढ़ा मैं जाने कहाँ-कहाँ आकाश में घूम आता था।

हो कहाँ अग्निधर्मा नवीन ऋषियों – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

कहता हूँ¸ ओ मखमल–भोगियो। श्रवण खोलो¸ रूक सुनो¸ विकल यह नाद कहां से आता है। है आग लगी या कहीं लुटेरे लूट रहे? वह कौन दूर पर गांवों में चिल्लाता है?

चलते हैं घड़ी के काँटे – विकाश कुमार

चलते हैं घड़ी के काँटे और काँटों पे चलते हम हर दिन जलने के बाद सूरज से ढलते हम

मेरे घर भी दिवाली है – विकाश कुमार

बना कर दिए मिट्टी के ज़रा सी आस पाली है , ख़रीद लो मेहनत मेरी , मेरे घर भी दिवाली है

अभिनव कला – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

प्यार के साथ सुधाधाार पिलाने वाली। जी-कली भाव विविधा संग खिलाने वाली। नागरी-बेलि नवल सींच जिलाने वाली। नीरसों मधय सरसतादि मिलाने वाली। देख लो फिर उगी साहित्य-गगन कर उजला। अति कलित कान्तिमती चारु हरीचन्द कला।1। जो रहा मंजु मधुप, नागरी-कमल-पग का। जो रहा मत पथिक-प्रेम के रुचिर मग का। जो रहा बन्धु सदय भाव-सहित सब जग का। जो रहा रक्त गरम जाति की निबल रग का। थी जिसे बुध्दि मिली पूत रसिकतादि बलित। है उसी उक्ति-सरसि-कंज की यह कीर्ति कलित।2।

उलहना – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

वही हैं मिटा देते कितने कसाले। वही हैं बड़ों की बड़ाई सम्हाले। वही हैं बड़े औ भले नाम वाले। वही हैं अँधेरे घरों के उँजाले। सभी जिनकी करतूत होती है ढब की। जो सुनते हैं, बातें ठिकाने की सब की।1। बिगड़ती हुई बात वे हैं बनाते। धधकती हुई आग वे हैं बुझाते। बहकतों को वे हैं ठिकाने लगाते। जो ऐंठे हैं उनको भी वे हैं मनाते। कुछ ऐसी दवा हाथ उनके है आई। कि धुल जाती है जिससे जी की भी काई।2।

बन-कुसुम – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

एक कुसुम कमनीय म्लान हो सूख विखर कर। पड़ा हुआ था धूल भरा अवनीतल ऊपर। उसे देख कर एक सुजन का जी भर आया। वह कातरता सहित वचन यह मुख पर लाया।1। अहो कुसुम यह सभी बात में परम निराला। योग्य करों में पड़ा नहीं बन सका न आला। जैसे ही यह बात कथन उसने कर पाई। वैसे ही रुचिकरी-उक्ति यह पड़ी सुनाई।2।

उद्बोधन – 1 – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

सज्जनो! देखिए, निज काम बनाना होगा। जाति-भाषा के लिए योग कमाना होगा।1। सामने आके उमग कर के बड़े बीरों लौं। मान हिन्दी का बढ़ा आन निभाना होगा।2। है कठिन कुछ नहीं कठिनाइयाँ करेंगी क्या। फूँक से हमको बलाओं को उड़ाना होगा।3।