कौन मिलनातुर नहीं है ? – हरिवंशराय बच्चन

आक्षितिज फैली हुई मिट्टी निरन्तर पूछती है,
कब कटेगा, बोल, तेरी चेतना का शाप,
और तू हों लीन मुझमे फिर बनेगा शान्त ?
कौन मिलनातुर नहीं है ?

गगन की निर्बन्ध बहती वायु प्रति पल पूछती है,
कब गिरेगी, टूट, तेरी देह की दीवार,
और तू हों लीन मुझमे फिर बनेगा मुक्त ?
कौन मिलनातुर नहीं है ?

सर्व व्यापी विश्व का व्यक्तित्व प्रति क्षण पूछता है,
कब मिटेगा, बोल, तेरे अहं का अभिमान,
और तू हों लीन मुझमे फिर बनेगा पूर्ण ?
कौन मिलनातुर नहीं है ?

                                          – हरिवंशराय बच्चन

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