कविता संग्रह

दीप मेरे जल अकम्पित – महादेवी वर्मा

दीप मेरे जल अकम्पित, घुल अचंचल! सिन्धु का उच्छवास घन है, तड़ित, तम का विकल मन है, भीति क्या नभ है व्यथा का आँसुओं से सिक्त अंचल!  स्वर-प्रकम्पित कर दिशायें, मीड़, सब भू की शिरायें, गा रहे आंधी-प्रलय तेरे लिये ही आज मंगल

तितली से – महादेवी वर्मा

मेह बरसने वाला है मेरी खिड़की में आ जा तितली। बाहर जब पर होंगे गीले, धुल जाएँगे रंग सजीले, झड़ जाएगा फूल, न तुझको बचा सकेगा छोटी तितली, खिड़की में तू आ जा तितली!

रीढ़ की हड्डी – हरिवंशराय बच्चन

मैं हूँ उनके साथ,खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़ कभी नही जो तज सकते हैं, अपना न्यायोचित अधिकार कभी नही जो सह सकते हैं, शीश नवाकर अत्याचार एक अकेले हों, या उनके साथ खड़ी हो भारी भीड़ मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़

हिंया नहीं कोऊ हमार – हरिवंशराय बच्चन

अस्‍त रवि ललौंछ रंजित पच्छिमी नभ; क्षितिज से ऊपर उठा सिर चल कर के एक तारा मद-आभा उदासी जैसे दबाए हुए अंदर आर्द्र नयनों मुस्‍कराता, एक सूने पथ पर चुपचाप एकाकी चले जाते मुसाफिर को कि जैसे कर रहा हो कुछ इशारा

ठाकुर जी भोले हैं – महादेवी वर्मा

ठंडे पानी से नहलातीं, ठंडा चंदन इन्हें लगातीं, इनका भोग हमें दे जातीं, फिर भी कभी नहीं बोले हैं। माँ के ठाकुर जी भोले हैं।

कोयल – महादेवी वर्मा

डाल हिलाकर आम बुलाता तब कोयल आती है। नहीं चाहिए इसको तबला, नहीं चाहिए हारमोनियम, छिप-छिपकर पत्तों में यह तो गीत नया गाती है!

अलि अब सपने की बात – महादेवी वर्मा

अलि अब सपने की बात- हो गया है वह मधु का प्रात! जब मुरली का मृदु पंचम स्वर, कर जाता मन पुलकित अस्थिर, कम्पित हो उठता सुख से भर, नव लतिका सा गात!

तुम्हारा फ़ोन आया है – कुमार विश्वास

अजब सी ऊब शामिल हो गयी है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चैखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अंगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

क्यों जीता हूँ – हरिवंशराय बच्चन

आधे से ज़्यादा जीवन जी चुकने पर मैं सोच रहा हूँ- क्यों जीता हूँ? लेकिन एक सवाल अहम इससे भी ज़्यादा, क्यों मैं ऎसा सोच रहा हूँ?

वे मधु दिन जिनकी स्मृतियों की – महादेवी वर्मा

वे मधु दिन जिनकी स्मृतियों की धुँधली रेखायें खोईं, चमक उठेंगे इन्द्रधनुष से मेरे विस्मृति के घन में! झंझा की पहली नीरवता- सी नीरव मेरी साधें, भर देंगी उन्माद प्रलय का मानस की लघु कम्पन में!