कविता संग्रह

प्यासी आँखें – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

कहें क्या बातें आँखों की । चाल चलती हैं मनमानी । सदा पानी में डूबी रह । नहीं रख सकती हैं पानी ।।१।। लगन है रोग या जलन है । किसी को कब यह बतलाया । जल भरा रहता है उनमें । पर उन्हें प्यासी ही पाया ।।२।।

मेरा माज़ी मेरे काँधे पर – कैफ़ि आज़मी

अब तमद्दुन की हो जीत के हार  मेरा माज़ी है अभी तक मेरे काँधे पर सवार आज भी दौड़ के गल्ले में जो मिल जाता हूँ  जाग उठता है मेरे सीने में जंगल कोई  सींग माथे पे उभर आते हैं  पड़ता रहता है मेरे माज़ी का साया मुझ पर दौर-ए-ख़ूँख्वारी से गुज़रा हूँ छिपाऊँ क्यों पर  दाँत सब खून में डूबे नज़र आते हैं 

आँसू और आँखें – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

दिल मचलता ही रहता है । सदा बेचैनी रहती है । लाग में आ आकर चाहत । न जाने क्या क्या कहती है ।।१।। कह सके यह कोई कैसे । आग जी की बुझ जाती है । कौन सा रस पाती है जो । आँख आँसू बरसाती है ।।२।।

दोशीज़ा मालन – कैफ़ि आज़मी

लो पौ फटी वो छुप गई तारों की अंजुमन लो जाम-ए-महर से वो छलकने लगी किरन खिंचने लगा निगाह में फ़ितरत का बाँकपन जल्वे ज़मीं पे बरसे ज़मीं बन गई दुल्हन

विबोधन – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

खुले न खोले नयन, कमल फूले, खग बोले; आकुल अलि-कुल उड़े, लता-तरु-पल्लव डोले। रुचिर रंग में रँगी उमगती ऊषा आई; हँसी दिग्वधू, लसी गगन में ललित लुनाई। दूब लहलही हुई पहन मोती की माला; तिमिर तिरोहित हुआ, फैलने लगा उँजाला। मलिन रजनिपति हुए, कलुष रजनी के भागे; रंजित हो अनुराग-राग से रवि अनुरागे। कर सजीवता दान बही नव-जीवन-धारा; बना ज्योतिमय ज्योति-हीन जन-लोचन-तारा। दूर हुआ अवसाद गात गत जड़ता भागी; बहा कार्य का सोत, अवनि की जनता जागी। निज मधुर उक्ति वर विभा से है उर-तिमिर भगा रही; जागो-जागो भारत-सुअन है, जग-जननि जगा रही।

अनूठी बातें – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

जो बहुत बनते हैं उनके पास से, चाह होती है कि कैसे टलें। जो मिलें जी खोलकर उनके यहाँ चाहता है कि सर के बल चलें॥ और की खोट देखती बेला, टकटकी लोग बाँध लेते हैं। पर कसर देखते समय अपनी, बेतरह आँख मूँद लेते हैं॥

दमदार दावे – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

जो आँख हमारी ठीक ठीक खुल जावे। तो किसे ताब है आँख हमें दिखलावे। है पास हमारे उन फूलों का दोना। है महँक रहा जिनसे जग का हर कोना। है करतब लोहे का लोहापन खोना। हम हैं पारस हो जिसे परसते सोना। जो जोत हमारी अपनी जोत जगावे। तो किसे ताब है आँख हमें दिखलावे

मेरा देश – विकास-कुमार

यह अमर कथा है भारत की सृष्टी के श्रेष्ठ विचारक की विश्व गुरु का ज्ञान जहां है स्वर्ण चिड़िया का बखान यहां है कल कल गंगा यहां बहती है चल चल कर यह कुछ कहती है मस्तक पर गिरिराज विराजे  सिंधु स्वम पाँव पखारे  उर पर बहती सरिता सुंदर

हमारा पतन – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

जैसा हमने खोया, न कोई खोवेगा ऐसा नहीं कोई कहीं गिरा होवेगा।। एक दिन थे हम भी बल विद्या बुद्धिवाले  एक दिन थे हम भी धीर वीर गुनवाले एक दिन थे हम भी आन निभानेवाले एक दिन थे हम भी ममता के मतवाले।। जैसा हम सोए क्या कोई सोवेगा। ऐसा नहीं कोई कहीं गिरा होवेगा।।

माँ – कुमार विश्वास

माँ पालती है पेड़ एक लाड़ से प्यार से दुलार से। माँ सुलाती है लोरी गा पिलाती है दूध लुटाती है तन मन प्राण