कविता संग्रह

मेरे नगपति! मेरे विशाल – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

मेरे नगपति! मेरे विशाल! साकार, दिव्य, गौरव विराट्, पौरुष के पुन्जीभूत ज्वाल! मेरी जननी के हिम-किरीट! मेरे भारत के दिव्य भाल! मेरे नगपति! मेरे विशाल!

संध्या सुन्दरी – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

दिवसावसान का समय- मेघमय आसमान से उतर रही है वह संध्या-सुन्दरी, परी सी, धीरे, धीरे, धीरे तिमिरांचल में चंचलता का नहीं कहीं आभास, मधुर-मधुर हैं दोनों उसके अधर, किंतु ज़रा गंभीर, नहीं है उसमें हास-विलास। हँसता है तो केवल तारा एक- गुँथा हुआ उन घुँघराले काले-काले बालों से,

नेक चलो नंदरानी उहां लगी – सूरदास

नेक चलो नंदरानी उहां लगी नेक चलो नंदारानी ॥ देखो आपने सुतकी करनी दूध मिलावत पानी ॥ हमरे शिरकी नयी चुनरिया ले गोरसमें सानी ॥ हमरे उनके करन बाद है हम देखावत जबानी ॥

गिरफ़्तार होने वाले हैं – सुभद्रा कुमारी चौहान

‘‘गिरफ़्तार होने वाले हैं, आता है वारंट अभी॥’’ धक-सा हुआ हृदय, मैं सहमी, हुए विकल साशंक सभी॥ किन्तु सामने दीख पड़े मुस्कुरा रहे थे खड़े-खड़े। रुके नहीं, आँखों से आँसू सहसा टपके बड़े-बड़े॥ ‘‘पगली, यों ही दूर करेगी माता का यह रौरव कष्ट?’’

राजा वसन्त वर्षा ऋतुओं की रानी – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

राजा वसन्त वर्षा ऋतुओं की रानी लेकिन दोनों की कितनी भिन्न कहानी राजा के मुख में हँसी कण्ठ में माला रानी का अन्तर द्रवित दृगों में पानी डोलती सुरभि राजा घर कोने कोने परियाँ सेवा में खड़ी सजा कर दोने खोले अंचल रानी व्याकुल सी आई उमड़ी जाने क्या व्यथा लगी वह रोने

भिक्षुक – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

वह आता-- दो टूक कलेजे को करता, पछताता  पथ पर आता। पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक, चल रहा लकुटिया टेक, मुट्ठी भर दाने को — भूख मिटाने को मुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता — दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।

ऐसे भक्ति मोहे भावे उद्धवजी – सूरदास

ऐसे भक्ति मोहे भावे उद्धवजी ऐसी भक्ति ।  सरवस त्याग मगन होय नाचे जनम करम गुन गावे ॥  कथनी कथे निरंतर मेरी चरन कमल चित लावे ॥  मुख मुरली नयन जलधारा करसे ताल बजावे ॥

खिलौनेवाला – सुभद्रा कुमारी चौहान

वह देखो माँ आज खिलौनेवाला फिर से आया है। कई तरह के सुंदर-सुंदर नए खिलौने लाया है। हरा-हरा तोता पिंजड़े में गेंद एक पैसे वाली छोटी सी मोटर गाड़ी है सर-सर-सर चलने वाली।

राजे ने अपनी रखवाली की – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

राजे ने अपनी रखवाली की; किला बनाकर रहा; बड़ी-बड़ी फ़ौजें रखीं । चापलूस कितने सामन्त आए । मतलब की लकड़ी पकड़े हुए

जागो पीतम प्यारा लाल – सूरदास

जागो पीतम प्यारा लाल तुम जागो बन्सिवाला ।  तुमसे मेरो मन लाग रह्यो तुम जागो मुरलीवाला ॥ बनकी चिडीयां चौं चौं बोले पंछी करे पुकारा ।  रजनि बित और भोर भयो है गरगर खुल्या कमरा ॥