ऊँचे पहाड़ पर, पेड़ नहीं लगते, पौधे नहीं उगते, न घास ही जमती है। जमती है सिर्फ बर्फ, जो, कफ़न की तरह सफ़ेद और, मौत की तरह ठंडी होती है। खेलती, खिलखिलाती नदी, जिसका रूप धारण कर, अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है।
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क्या खोया, क्या पाया – अटल बिहारी वाजपेयी
क्या खोया, क्या पाया जग में मिलते और बिछुड़ते मग में मुझे किसी से नहीं शिकायत यद्यपि छला गया पग-पग में एक दृष्टि बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें!
आओ फिर से दिया जलाएँ – अटल बिहारी वाजपेयी
आओ फिर से दिया जलाएँ भरी दुपहरी में अंधियारा सूरज परछाई से हारा अंतरतम का नेह निचोड़ें- बुझी हुई बाती सुलगाएँ। आओ फिर से दिया जलाएँ
फूल और काँटा – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
हैं जन्म लेते जगह में एक ही, एक ही पौधा उन्हें है पालता रात में उन पर चमकता चाँद भी, एक ही सी चाँदनी है डालता। है खटकता एक सबकी आँख में दूसरा है सोहता सुर शीश पर, किस तरह कुल की बड़ाई काम दे जो किसी में हो बड़प्पन की कसर।
एक बरस बीत गया – अटल बिहारी वाजपेयी
एक बरस बीत गया झुलासाता जेठ मास शरद चांदनी उदास सिसकी भरते सावन का अंतर्घट रीत गया एक बरस बीत गया
कोयल – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
काली-काली कू-कू करती, जो है डाली-डाली फिरती! कुछ अपनी हीं धुन में ऐंठी छिपी हरे पत्तों में बैठी जो पंचम सुर में गाती है वह हीं कोयल कहलाती है. जब जाड़ा कम हो जाता है सूरज थोड़ा गरमाता है
मीठी बोली – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
बस में जिससे हो जाते हैं प्राणी सारे। जन जिससे बन जाते हैं आँखों के तारे। पत्थर को पिघलाकर मोम बनानेवाली मुख खोलो तो मीठी बोली बोलो प्यारे।। रगड़ो, झगड़ो का कडुवापन खोनेवाली। जी में लगी हुई काई को धानेवाली। सदा जोड़ देनेवाली जो टूटा नाता मीठी बोली प्यार बीज है बोनेवाली।। काँटों में भी सुंदर फूल खिलानेवाली।
मौत से ठन गई – अटल बिहारी वाजपेयी
ठन गई! मौत से ठन गई! जूझने का मेरा इरादा न था, मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था, रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई, यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।
आ री नींद – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
आ री नींद, लाल को आ जा। उसको करके प्यार सुला जा।। तुझे लाल हैं ललक बुलाते। अपनी आँखों पर बिठलाते।। तेरे लिए बिछाई पलकें। बढ़ती ही जाती हैं ललकें।। क्यों तू है इतनी इठलाती। आ-आ मैं हूँ तुझे बुलाती।। गोद नींद की है अति प्यारी। फूलों से है सजी-सँवारी।।
जीवन की ढलने लगी सांझ – अटल बिहारी वाजपेयी
जीवन की ढलने लगी सांझ उमर घट गई डगर कट गई जीवन की ढलने लगी सांझ।




