मेघदूत के प्रति – हरिवंशराय बच्चन

"मेघ" जिस जिस काल पढ़ता, मैं स्वयं बन मेघ जाता! हो धरणि चाहे शरद की चाँदनी में स्नान करती, वायु ऋतु हेमंत की चाहे गगन में हो विचरती,

रात आधी, खींच कर मेरी हथेली – हरिवंशराय बच्चन

रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।  फ़ासला था कुछ हमारे बिस्तरों में और चारों ओर दुनिया सो रही थी, तारिकाएँ ही गगन की जानती हैं जो दशा दिल की तुम्हारे हो रही थी, मैं तुम्हारे पास होकर दूर तुमसे

दुनिया का इतिहास पूछता – अटल बिहारी वाजपेयी

दुनिया का इतिहास पूछता, रोम कहाँ, यूनान कहाँ? घर-घर में शुभ अग्नि जलाता। वह उन्नत ईरान कहाँ है? दीप बुझे पश्चिमी गगन के, व्याप्त हुआ बर्बर अंधियारा, किन्तु चीर कर तम की छाती,

मैं अखिल विश्व का गुरू महान – अटल बिहारी वाजपेयी

मैं अखिल विश्व का गुरू महान, देता विद्या का अमर दान, मैंने दिखलाया मुक्ति मार्ग मैंने सिखलाया ब्रह्म ज्ञान। मेरे वेदों का ज्ञान अमर, मेरे वेदों की ज्योति प्रखर

आ रही रवि की सवारी – हरिवंशराय बच्चन

आ रही रवि की सवारी। नव-किरण का रथ सजा है, कलि-कुसुम से पथ सजा है, बादलों-से अनुचरों ने स्‍वर्ण की पोशाक धारी। आ रही रवि की सवारी।

जो बरसों तक सड़े जेल में – अटल बिहारी वाजपेयी

जो बरसों तक सड़े जेल में, उनकी याद करें। जो फाँसी पर चढ़े खेल में, उनकी याद करें। याद करें काला पानी को, अंग्रेजों की मनमानी को, कोल्हू में जुट तेल पेरते, सावरकर से बलिदानी को। याद करें बहरे शासन को,

राह कौन सी जाऊँ मैं ? – अटल बिहारी वाजपेयी

चौराहे पर लुटता चीर प्यादे से पिट गया वजीर चलूँ आखिरी चाल कि बाजी छोड़ विरक्ति सजाऊँ? राह कौन सी जाऊँ मैं? सपना जन्मा और मर गया मधु ऋतु में ही बाग झर गया तिनके टूटे हुये बटोरूँ या नवसृष्टि सजाऊँ मैं? राह कौन सी जाऊँ मैं?

दो अनुभूतियाँ – अटल बिहारी वाजपेयी

गीत नहीं गाता हूँ बेनक़ाब चेहरे हैं, दाग़ बड़े गहरे हैं  टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूँ गीत नहीं गाता हूँ लगी कुछ ऐसी नज़र बिखरा शीशे सा शहर

लला फिर आइयो खेलन होरी – पद्माकर

फागु की भीर, अभीरिन में गहि गोंवदै लै गई भीतर गोरी। भाई करी मन की पद्माकर, ऊपर नाई अबीर की झोरी छीनि पितंबर कम्मर तें सु बिदा दई मीड़ि कपोलन रोरी। नैन नचाय कही मुसुकाय, 'लला फिर आइयो खेलन होरी

हिरोशिमा की पीड़ा – अटल बिहारी वाजपेयी

किसी रात को  मेरी नींद चानक उचट जाती है  आँख खुल जाती है  मैं सोचने लगता हूँ कि  जिन वैज्ञानिकों ने अणु अस्त्रों का  आविष्कार किया था  वे हिरोशिमा-नागासाकी के भीषण