कर्मवीर – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

देख कर बाधा विविध, बहु विघ्न घबराते नहीं  रह भरोसे भाग्य के दुख भोग पछताते नहीं  काम कितना ही कठिन हो किन्तु उकताते नहीं  भीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहीं  हो गये एक आन में उनके बुरे दिन भी भले  सब जगह सब काल में वे ही मिले फूले फले । 

एक नया अनुभव – हरिवंशराय बच्चन

कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था भावना के हाथ ने जिसमें वितानों को तना था। स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर, कंकड़ों को एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है।

है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है – हरिवंशराय बच्चन

कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था भावना के हाथ ने जिसमें वितानों को तना था। स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर, कंकड़ों को एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है।

क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी? – हरिवंशराय बच्चन

क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी? क्या करूँ? मैं दुखी जब-जब हुआ संवेदना तुमने दिखाई, मैं कृतज्ञ हुआ हमेशा, रीति दोनो ने निभाई, किन्तु इस आभार का अब हो उठा है बोझ भारी; क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी? क्या करूँ?

फूल – महादेवी वर्मा

मधुरिमा के, मधु के अवतार सुधा से, सुषमा से, छविमान, आंसुओं में सहमे अभिराम तारकों से हे मूक अजान! सीख कर मुस्काने की बान कहां आऎ हो कोमल प्राण! स्निग्ध रजनी से लेकर हास रूप से भर कर सारे अंग, नये पल्लव का घूंघट डाल अछूता ले अपना मकरंद, ढूढं पाया कैसे यह देश? स्वर्ग के हे मोहक संदेश!

अधिकार – महादेवी वर्मा

वे मुस्काते फूल, नहीं  जिनको आता है मुर्झाना,  वे तारों के दीप, नहीं  जिनको भाता है बुझ जाना;  वे नीलम के मेघ, नहीं  जिनको है घुल जाने की चाह  वह अनन्त रितुराज,नहीं  जिसने देखी जाने की राह| 

साथी सो न कर कुछ बात – हरिवंशराय बच्चन

साथी सो न कर कुछ बात। पूर्ण कर दे वह कहानी,  जो शुरू की थी सुनानी, आदि जिसका हर निशा में, अन्त चिर अज्ञात साथी सो न कर कुछ बात।

तब रोक न पाया मैं आंसू – हरिवंशराय बच्चन

जिसके पीछे पागल होकर मैं दौडा अपने जीवन-भर, जब मृगजल में परिवर्तित हो मुझ पर मेरा अरमान हंसा! तब रोक न पाया मैं आंसू! जिसमें अपने प्राणों को भर कर देना चाहा अजर-अमर, जब विस्मृति के पीछे छिपकर मुझ पर वह मेरा गान हंसा! तब रोक न पाया मैं आंसू!

तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाए – हरिवंशराय बच्चन

तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाए! मेरे वर्ण-वर्ण विश्रंखल, चरण-चरण भरमाए, गूंज-गूंज कर मिटने वाले मैनें गीत बनाये;

सजनि कौन तम में परिचित सा – महादेवी वर्मा

सजनि कौन तम में परिचित सा, सुधि सा, छाया सा, आता? सूने में सस्मित चितवन से जीवन-दीप जला जाता! छू स्मृतियों के बाल जगाता, मूक वेदनायें दुलराता, हृततंत्री में स्वर भर जाता, बंद दृगों में, चूम सजल सपनों के चित्र बना जाता!