सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी, गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी। चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
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गरुड़ को दावा – भूषण
गरुड़ को दावा जैसे नाग के समूह पर दावा नाग जूह पर सिंह सिरताज को
पद्मिनी गोरा बादल – नरेंद्र मिश्र
पद्मिनी गोरा बादल नरेंद्र मिश्रा द्वारा हिंदी में एक अद्भुत कविता है यह राजपूत योद्धाओं गोरा और बादल की बहादुरी का वर्णन करता है जिन्होंने चित्तोड़ के राजा रावल रतन सिंह को बचाते हैं जिन्हें अलाउद्दीन खिलजी ने बंदी बना लिया था।
राखी हिन्दुवानी हिन्दुवान को तिलक राख्यौ – भूषण
राखी हिन्दुवानी हिन्दुवान को तिलक राख्यौ अस्मृति पुरान राखे वेद धुन सुनी मैं
इन्द्र जिमि जंभ पर – भूषण
इन्द्र जिमि जंभ पर, बाडब सुअंभ पर, रावन सदंभ पर, रघुकुल राज हैं। पौन बारिबाह पर, संभु रतिनाह पर, ज्यौं सहस्रबाह पर राम-द्विजराज हैं॥
जौहर : स्वप्न – श्याम नारायण पांडेय
आन पर जो मौत से मैदान लें, गोलियों के लक्ष्य पर उर तान लें। वीरसू चित्तौड़ गढ़ के वक्ष पर जुट गए वे शत्रु के जो प्राण लें॥
जौहर : दरबार – श्याम नारायण पांडेय
अंधकार था घोर धरा पर अभय घूमते चोर धरा पर। चित्रित पंख मिला पंखों से सोए वन के मोर धरा पर॥
जौहर : आखेट – श्याम नारायण पांडेय
दोपहरी थी, ताप बढ़ा था, पूर्वजन्म का पाप बढ़ा था। जल – थल – नभ के शिर पर मानो, दुर्वासा का शाप चढ़ा था॥
जौहर : उन्माद – श्याम नारायण पांडेय
शीशमहल की दीवालों पर शोभित नंगी तसवीरें। चित्रकार ने लिखीं बेगमों की बहुरंगी तस्वीरें॥
जौहर : युद्ध – श्याम नारायण पांडेय
निशि चली जा रही थी काली प्राची में फैली थी लाली। विहगों के कलरव करने से, थी गूँज रही डाली डाली॥





