आपकी याद आती रही रात-भर – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

"आपकी याद आती रही रात-भर" चाँदनी दिल दुखाती रही रात-भर गाह जलती हुई, गाह बुझती हुई शम-ए-ग़म झिलमिलाती रही रात-भर

रक़ीब के नाम – रुचिका मान ‘रूह’

वो...जिसने  बड़ी नवाज़िश से मेरी सियाह रातों पे एहसान किया था और बड़े नाज़ों से मेरी बेपनाह वफ़ा का पैमाँ लिया था जो...नज़ाकत से मेरी रूह को फना कर गया  और नाहक ही मेरे इश्क़ को गुनाह कर गया वो...मेरी ज़ीस्त कि हकीकत मेरी साँसों की  कैफियत

ख़ुश हैं सब – राज़िक अंसारी

बतलाते हैं सारे मंज़र ख़ुश हैं सब अन्दर से है टूटे बाहर ख़ुश हैं सब देख लो अपनी प्यास छुपाने का अंजाम बोल रहा है एक समन्दर ख़ुश हैं सब

वाक़िफ़ हैं – राज़िक अंसारी

दिल की रंगीनियों से वाक़िफ़ हैं  फूल हैं, तितलियों से वाक़िफ़ हैं  आंधिओं की हंसी उड़ाएंगे जो हमारे दियों से वाक़िफ़ हैं 

चलो चल कर वहीं पर बैठते हैं – राज़िक अंसारी

चलो चल कर वहीं पर बैठते हैं जहां पर सब बराबर बैठते हैं न जाने क्यों घुटन सी हो रही है बदन से चल के बाहर बैठते हैं

लड़ते देखता हूं – राज़िक अंसारी

मैं जब रिश्तों को लड़ते देखता हूं हवेली को उजड़ते देखता हूँ न जाने क्यों मुझे लगता है , मैं हूँ किसी को जब बिछड़ते देखता हूँ

दिल – राज़िक अंसारी

एक नन्हा मुन्ना बच्चा यही कोई 8-10 साल का फटा हुआ लिबास या यूं कहो पहनने के नाम पर बस चिथड़ा खींचता जा रहा है एक गाड़ी, बिना इंजन की, सही समझे-छकड़ा

कहूँ जो हाल, तो कहते हो – मिर्ज़ा ग़ालिब

कहूं जो हाल तो कहते हो 'मुद्द`आ कहिये' तुम्हीं कहो कि जो तुम यूं कहो तो क्या कहिये न कहियो त`न से फिर तुम कि हम सितमगर हैं मुझे तो ख़ू है कि जो कुछ कहो बजा कहिये

एक पल में एक सदी का मज़ा हमसे पूछिए – ख़ुमार बाराबंकवी

एक पल में एक सदी का मज़ा हमसे पूछिए , दो दिन की ज़िन्दगी का मज़ा हमसे पूछिए !

गुलों में रंग भरे – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले