रंग है दिल का – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

तुम न आये थे तो हर चीज़ वहीं थी कि जो है आसमां हद्दे-नज़र, राहगुज़र राहगुज़र, शीशा-ए-मय शीशा-ए-मय  और अब शीशा-ए-मय, राहगुज़र, रंग-ए-फलक रंग है दिल का मेरे खूने-जिगर होने तक चम्पई रंग कभी, राहते-दीदार का रंग सुर्मई रंग की है साअते-बेज़ार का रंग

मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न माँग – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़शाँ[1] है हयात[2] तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर[3] का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम[4] में बहारों को सबात[5] तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है  तू जो मिल जाये तो तक़दीर निगूँ[6] हो जाये यूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाये और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा

दिल के क़राइन- फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

वहीं हैं, दिल के क़राइन तमाम कहते हैं वो इक ख़लिश कि जिसे तेरा नाम कहते हैं  तुम आ रहे हो कि बजती हैं मेरी ज़ंजीरें न जाने क्या मेरे दीवारो-बाम कहते हैं  यही कनारे-फ़लक का सियहतरीं गोशा यही है मतलए-माहे-तमाम कहते हैं 

वफ़ा-ए-वा’दः नहीं – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

वफ़ा-ए-वा'दः नहीं, वा'दः-ए-दिगर भी नहीं वो मुझसे रूठे तो थे, लेकिन इस क़दर भी नहीं  बरस रही है हरीमे-हवस मे दौलते-हुस्न गदा-ए-इ'श्क़ के कासे मे इक नज़र भी नहीं 

तेरी सूरत – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

तेरी सूरत जो दिलनशीं की है आशना शक्ल हर हसीं की है  हुस्न से दिल लगा के हस्ती की हर घड़ी हमने आतशीं की है  सुबहे-गुल हो की शामे-मैख़ाना मदह उस रू-ए-नाज़नीं की है 

सितम सिखलायेगा रस्मे-वफा – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

सितम सिखलायेगा रस्मे-वफा, ऐसे नहीं होता सनम दिखलायेंगे राहे-खुदा, ऐसे नहीं होता  गिनो सब हसरतें, जो खूं हुई हैं तन के मक़तल में मेरे क़ातिल हिसाबे-खूबहां, ऐसे नहीं होता 

सितम की रस्में – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

सितम की रस्में बहुत थीं लेकिन, न थी तेरी अंजुमन से पहले सज़ा खता-ए-नज़र से पहले, इताब ज़ुर्मे-सुखन से पहले  जो चल सको तो चलो के राहे-वफा बहुत मुख्तसर हुई है मुक़ाम है अब कोई न मंजिल, फराज़े-दारो-रसन से पहले 

शफ़क़ की राख में – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

शाख़ पर ख़ूने-गुल रवाँ है वही शोख़ी-ए-रंगे-गुलसिताँ है वही  सर वही है तो आस्ताँ है वही जाँ वही है तो जाने-जाँ है वही  अब जहाँ मेहरबाँ नहीं कोई कूचः-ए-यारे-मेहरबाँ है वही 

शाख़ पर ख़ूने-गुल रवाँ है वही – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

शाख़ पर ख़ूने-गुल रवाँ है वही शोख़ी-ए-रंगे-गुलसिताँ है वही  सर वही है तो आस्ताँ है वही जाँ वही है तो जाने-जाँ है वही  अब जहाँ मेहरबाँ नहीं कोई कूचः-ए-यारे-मेहरबाँ है वही 

सब क़त्ल होके – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

सब क़त्ल होके तेरे मुक़ाबिल से आये हैं हम लोग सुर्ख-रू हैं कि मंजिल से आये हैं  शम्मए नज़र, खयाल के अंजुम, जिगर के दाग़ जितने चिराग़ हैं तेरी महफ़िल से आये हैं