ऐसे ही विचरण करता मन पहुँच गया क्रीड़ास्थल पर, ऋषिमा जहाँ खेलने आती , अपनी मम्मी को संग लेकर । साधन वहाँ प्रतिस्थापित थे मन बहलाने हेतु अनेक किन्तु अनूठा दिखलाई , पड़ता था उनमें से एक । वह था एक अचेतन लेकिन , होता प्रतीत चेतन युक्त लहराता दोनों हाथों को मानो करता सबका … Continue reading मन विचरण करता रहता है – ज्ञान प्रकाश सिंह
कविता संग्रह
मैं क्या क्या छोड़ आया हूँ – ज्ञान प्रकाश सिंह
क्लब के सामने ऋषिमा ने, जहाँ फ़ोटो खिंचाया था गमकते लहलहाते फूलों की क्यारी छोड़ आया हूँ । पैदल रास्ते पर रुक कर, जिसे ऋषिमा दिखाती थी पक्की सड़क के मोड़ पर, उस ‘जे’ को छोड़ आया हूँ । जिनकी ओट से बच्चे ने, हाइड-सीक खेला था बार-बी-क्यू के पास, … Continue reading मैं क्या क्या छोड़ आया हूँ – ज्ञान प्रकाश सिंह
सब याद है मुझको अब भी… – ज्ञान प्रकाश सिंह
ऋषिमा अब उस पते पर नहीं रहती किंतु सब याद है मुझको अब भी । फ़्लैट की बाल्कनी में खड़ी हो मेरे साथ जब भी , आते पवन के तेज़ झोंकों को ऊँचे स्वर में रुक जाने को कहती थी और जब तेज़ बारिश हो उसे जाने को कहती थी । ‘स्टॉप विंड , स्टॉप … Continue reading सब याद है मुझको अब भी… – ज्ञान प्रकाश सिंह
कुछ नहीं… – विकाश कुमार
जिया भी कुछ नहीं , किया भी कुछ नहीं... वो एक मौज आके यूँ गयी की... बहा भी कुछ नहीं , और रहा भी कुछ नहीं । लिया भी कुछ नहीं , दिया भी कुछ नहीं । रिश्तों का हिसाब करके देखा तो समझा... ख़र्चा भी कुछ नहीं , बचा भी कुछ नहीं । कहा भी … Continue reading कुछ नहीं… – विकाश कुमार

