क्षमा करो बापू! तुम हमको, बचन भंग के हम अपराधी, राजघाट को किया अपावन, मंज़िल भूले, यात्रा आधी।
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झुक नहीं सकते – अटल बिहारी वाजपेयी
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते सत्य का संघर्ष सत्ता से न्याय लड़ता निरंकुशता से अंधेरे ने दी चुनौती है किरण अंतिम अस्त होती है
भारत जमीन का टुकड़ा नहीं – अटल बिहारी वाजपेयी
भारत जमीन का टुकड़ा नहीं, जीता जागता राष्ट्रपुरुष है। हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है, पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं।
दीन – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”
सह जाते हो उत्पीड़न की क्रीड़ा सदा निरंकुश नग्न, हृदय तुम्हारा दुबला होता नग्न, अन्तिम आशा के कानों में स्पन्दित हम - सबके प्राणों में अपने उर की तप्त व्यथाएँ, क्षीण कण्ठ की करुण कथाएँ
मुक्ति – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”
तोड़ो, तोड़ो, तोड़ो कारा पत्थर, की निकलो फिर, गंगा-जल-धारा! गृह-गृह की पार्वती! पुनः सत्य-सुन्दर-शिव को सँवारती उर-उर की बनो आरती!-- भ्रान्तों की निश्चल ध्रुवतारा!-- तोड़ो, तोड़ो, तोड़ो कारा!
मौन – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”
बैठ लें कुछ देर, आओ,एक पथ के पथिक-से प्रिय, अंत और अनन्त के, तम-गहन-जीवन घेर। मौन मधु हो जाए
अट नहीं रही है – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”
अट नहीं रही है आभा फागुन की तन सट नहीं रही है।
बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”
बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु! पूछेगा सारा गाँव, बंधु!
जब यह दीप थके – महादेवी वर्मा
यह चंचल सपने भोले है, दृग-जल पर पाले मैने, मृदु पलकों पर तोले हैं; दे सौरभ के पंख इन्हें सब नयनों में पहुँचाना!
अलि, मैं कण-कण को जान चली – महादेवी वर्मा
अलि, मैं कण-कण को जान चली







