यह किसका मन डोला? मृदुल पुतलियों के उछाल पर, पलकों के हिलते तमाल पर, नि:श्वासों के ज्वाल-जाल पर, कौन लिख रहा व्यथा कथा?
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एक विनय – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
बड़े ही ढँगीले बड़े ही निराले। अछूती सभी रंगतों बीच ढाले। दिलों के घरों के कुलों के उँजाले। सुनो ऐ सुजन पूत करतूत वाले। तुम्हीं सब तरह हो हमारे सहारे। तुम्हीं हो नई सूझ आँखों के तारे।1।
जागना अपराध – माखनलाल चतुर्वेदी
जागना अपराध! इस विजन-वन गोद में सखि, मुक्ति-बन्धन-मोद में सखि, विष-प्रहार-प्रमोद में सखि,
आशालता – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
कुछ उरों में एक उपजी है लता। अति अनूठी लहलही कोमल बड़ी। देख कर उसको हरा जी हो गया। वह बताई है गयी जीवन-जड़ी।1।
तुम मन्द चलो – माखनलाल चतुर्वेदी
तुम मन्द चलो, ध्वनि के खतरे बिखरे मग में- तुम मन्द चलो। सूझों का पहिन कलेवर-सा, विकलाई का कल जेवर-सा, घुल-घुल आँखों के पानी में- फिर छलक-छलक बन छन्द चलो। पर मन्द चलो।
उलहना – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
वही हैं मिटा देते कितने कसाले। वही हैं बड़ों की बड़ाई सम्हाले। वही हैं बड़े औ भले नाम वाले। वही हैं अँधेरे घरों के उँजाले। सभी जिनकी करतूत होती है ढब की। जो सुनते हैं, बातें ठिकाने की सब की।1।
बसंत मनमाना – माखनलाल चतुर्वेदी
चादर-सी ओढ़ कर ये छायाएँ तुम कहाँ चले यात्री, पथ तो है बाएँ। धूल पड़ गई है पत्तों पर डालों लटकी किरणें छोटे-छोटे पौधों को चर रहे बाग में हिरणें, दोनों हाथ बुढ़ापे के थर-थर काँपे सब ओर किन्तु आँसुओं का होता है कितना पागल ज़ोर- बढ़ आते हैं, चढ़ आते हैं, गड़े हुए हों जैसे
अभिनव कला – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
प्यार के साथ सुधाधाार पिलाने वाली। जी-कली भाव विविधा संग खिलाने वाली। नागरी-बेलि नवल सींच जिलाने वाली। नीरसों मधय सरसतादि मिलाने वाली। देख लो फिर उगी साहित्य-गगन कर उजला। अति कलित कान्तिमती चारु हरीचन्द कला।1।
दूबों के दरबार में – माखनलाल चतुर्वेदी
क्या आकाश उतर आया है दूबों के दरबार में? नीली भूमि हरी हो आई इस किरणों के ज्वार में ! क्या देखें तरुओं को उनके फूल लाल अंगारे हैं;
उद्बोधन – 1 – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
सज्जनो! देखिए, निज काम बनाना होगा। जाति-भाषा के लिए योग कमाना होगा।1। सामने आके उमग कर के बड़े बीरों लौं। मान हिन्दी का बढ़ा आन निभाना होगा।2। है कठिन कुछ नहीं कठिनाइयाँ करेंगी क्या। फूँक से हमको बलाओं को उड़ाना होगा।3।


