सावरे मोकु रंगमें बोरी बोरी सांवरे मोकुं रंगमें बोरी बोरी बहीयां पकर कर शीरकी गागरिया । छिन गागर ढोरी । रंगमें रस बस मोकूं किनी । डारी गुलालनकी झोरी । गावत लागे मुखसे होरी आयो अचानक मिले मंदिरमें । देखत नवल किशोरी । धरी भूजा मोकुं पकरी जीवनने बलजोरे । माला मोतियनकी तोरी तब मोरे जोर कछु न चालो । बात कठीन सुनाई
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सूरदास का जन्म 1478 ईस्वी में रुनकता नामक गाँव में हुआ। यह गाँव मथुरा-आगरा मार्ग के किनारे स्थित है। सूरदास का नाम कृष्ण भक्ति की अजस्र धारा को प्रवाहित करने वाले भक्त कवियों में सर्वोपरि है। हिन्दी साहित्य में भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य उपासक और ब्रजभाषा के श्रेष्ठ कवि महात्मा सूरदास हिंदी साहित्य के सूर्य माने जाते हैं। हिंदी कविता कामिनी के इस कमनीय कांत ने हिंदी भाषा को समृद्ध करने में जो योगदान दिया है, वह अद्वितीय है। सूरदास हिंन्दी साहित्य में भक्ति काल के सगुण भक्ति शाखा के कृष्ण-भक्ति उपशाखा के महान कवि हैं।कुछ विद्वानों का मत है कि सूर का जन्म सीही नामक ग्राम में एक निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बाद में ये आगरा और मथुरा के बीच गऊघाट पर आकर रहने लगे थे। सूरदास के पिता, रामदास गायक थे। सूरदास के जन्मांध होने के विषय में मतभेद है। प्रारंभ में सूरदास आगरा के समीप गऊघाट पर रहते थे। वहीं उनकी भेंट श्री वल्लभाचार्य से हुई और वे उनके शिष्य बन गए। वल्लभाचार्य ने उनको पुष्टिमार्ग में दीक्षित कर के कृष्णलीला के पद गाने का आदेश दिया। सूरदास की मृत्यु गोवर्धन के निकट पारसौली ग्राम में (1580) ईस्वी में हुई।
रचनाएँ
सूरदास जी द्वारा लिखित पाँच ग्रन्थ बताए जाते हैं:
(1) सूरसागर – जो सूरदास की प्रसिद्ध रचना है। जिसमें सवा लाख पद संग्रहित थे। किंतु अब सात-आठ हजार पद ही मिलते हैं।
(2) सूरसारावली
(3) साहित्य-लहरी – जिसमें उनके कूट पद संकलित हैं।
(4) नल-दमयन्ती
(5) ब्याहलो
उपरोक्त में अन्तिम दो अप्राप्य हैं।
नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित हस्तलिखित पुस्तकों की विवरण तालिका में सूरदास के १६ ग्रन्थों का उल्लेख है। इनमें सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य लहरी, नल-दमयन्ती, ब्याहलो के अतिरिक्त दशमस्कंध टीका, नागलीला, भागवत्, गोवर्धन लीला, सूरपचीसी, सूरसागर सार, प्राणप्यारी, आदि ग्रन्थ सम्मिलित हैं। इनमें प्रारम्भ के तीन ग्रंथ ही महत्त्वपूर्ण समझे जाते हैं, साहित्य लहरी की प्राप्त प्रति में बहुत प्रक्षिप्तांश जुड़े हुए हैं।
दरसन बिना तरसत मोरी अखियां – सूरदास
दरसन बिना तरसत मोरी अखियां तुमी पिया मोही छांड सीधारे फरकन लागी छतिया बस्ति छाड उज्जड किनी व्याकुल भई सब सखियां सूरदास कहे प्रभु तुमारे मिलनकूं ज्युजलंती मुख बतिया
नेननमें लागि रहै – सूरदास
नेननमें लागि रहै गोपाळ नेननमें ॥ध्रु०॥ मैं जमुना जल भरन जात रही भर लाई जंजाल ॥१॥ रुनक झुनक पग नेपुर बाजे चाल चलत गजराज ॥२॥ जमुनाके नीर तीर धेनु चरावे संग लखो लिये ग्वाल ॥३॥ बिन देखे मोही कल न परत है निसदिन रहत बिहाल ॥४॥ लोक लाज कुलकी मरजादा निपट भ्रमका जाल ॥५॥
देखो माई हलधर गिरधर जोरी – सूरदास
देखो माई हलधर गिरधर जोरी ॥ हलधर हल मुसल कलधारे गिरधर छत्र धरोरी ॥१॥ हलधर ओढे पित पितांबर गिरधर पीत पिछोरी॥२॥ हलधर केहे मेरी कारी कामरी गीरधरने ली चोरी॥३॥ सूरदास प्रभुकी छबि निरखे भाग बडे जीन कोरी॥४॥
नेक चलो नंदरानी उहां लगी – सूरदास
नेक चलो नंदरानी उहां लगी नेक चलो नंदारानी ॥ देखो आपने सुतकी करनी दूध मिलावत पानी ॥ हमरे शिरकी नयी चुनरिया ले गोरसमें सानी ॥ हमरे उनके करन बाद है हम देखावत जबानी ॥
ऐसे भक्ति मोहे भावे उद्धवजी – सूरदास
ऐसे भक्ति मोहे भावे उद्धवजी ऐसी भक्ति । सरवस त्याग मगन होय नाचे जनम करम गुन गावे ॥ कथनी कथे निरंतर मेरी चरन कमल चित लावे ॥ मुख मुरली नयन जलधारा करसे ताल बजावे ॥
जागो पीतम प्यारा लाल – सूरदास
जागो पीतम प्यारा लाल तुम जागो बन्सिवाला । तुमसे मेरो मन लाग रह्यो तुम जागो मुरलीवाला ॥ बनकी चिडीयां चौं चौं बोले पंछी करे पुकारा । रजनि बित और भोर भयो है गरगर खुल्या कमरा ॥
बासरी बजाय आज रंगसो मुरारी – सूरदास
बासरी बजाय आज रंगसो मुरारी । शिव समाधि भूलि गयी मुनि मनकी तारी ॥ बा०॥ध्रु०॥ बेद भनत ब्रह्मा भुले भूले ब्रह्मचरी । सुनतही आनंद भयो लगी है करारी ॥ बास०॥१॥ रंभा सब ताल चूकी भूमी नृत्य कारी ।
देख देख एक बाला जोगी – सूरदास
देख देख एक बाला जोगी द्वारे मेरे आया हो ॥ध्रु०॥ पीतपीतांबर गंगा बिराजे अंग बिभूती लगाया हो । तीन नेत्र अरु तिलक चंद्रमा जोगी जटा बनाया हो ॥१॥ भिछा ले निकसी नंदरानी मोतीयन थाल भराया हो ।
नंद दुवारे एक जोगी आयो – सूरदास
नंद दुवारे एक जोगी आयो शिंगी नाद बजायो । सीश जटा शशि वदन सोहाये अरुण नयन छबि छायो ॥ नंद ॥ध्रु०॥ रोवत खिजत कृष्ण सावरो रहत नही हुलरायो । लीयो उठाय गोद नंदरानी द्वारे जाय दिखायो ॥नंद०॥१॥

