चपला – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

चपले! क्यों चमक-चमक कर मेघों में छिप जाती हो? क्यों रूप-छटा तुम अपनी दिखला कर भग जाती हो?॥1॥

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सच ये है बेकार हमें ग़म होता है  – जावेद अख़्तर

सच ये है बेकार हमें ग़म होता है  जो चाहा था दुनिया में कम होता है  ढलता सूरज फैला जंगल रस्ता गुम  हमसे पूछो कैसा आलम होता है 

बन-कुसुम – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

एक कुसुम कमनीय म्लान हो सूख विखर कर। पड़ा हुआ था धूल भरा अवनीतल ऊपर। उसे देख कर एक सुजन का जी भर आया। वह कातरता सहित वचन यह मुख पर लाया

निर्झर – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

ओ निर्झर! झर्-झर्-झर्, कल-कल करता बता रहता तू, प्रतिपल क्यों अविरल?॥1॥

हम तो बचपन में भी अकेले थे – जावेद अख़्तर

हम तो बचपन में भी अकेले थे सिर्फ़ दिल की गली में खेले थे   इक तरफ़ मोर्चे थे पलकों के  इक तरफ़ आँसुओं के रेले थे 

कुसुम चयन – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

जो न बने वे विमल लसे विधु-मौलि मौलि पर। जो न बने रमणीय सज, रमा-रमण कलेवर। बर बृन्दारक बृन्द पूज जो बने न बन्दित। जो न सके अभिनन्दनीय को कर अभिनन्दित। जो विमुग्धा कर हुए वे न बन मंजुल-माला।

सरिता – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

सरिते! क्यों अविरल गति से प्रतिपल बहती रहती हो? क्षण-भर के लिए कहीं भी विश्राम क्यों न करती हो?॥1॥

मुझको यक़ीं है सच कहती थीं – जावेद अख़्तर

मुझको यक़ीं है सच कहती थीं जो भी अम्मी कहती थीं  जब मेरे बचपन के दिन थे चाँद में परियाँ रहती थीं  एक ये दिन जब अपनों ने भी हमसे नाता तोड़ लिया  एक वो दिन जब पेड़ की शाख़ें बोझ हमारा सहती थीं  एक ये दिन जब सारी सड़कें रूठी-रूठी लगती हैं  एक वो दिन जब 'आओ खेलें' सारी गलियाँ कहती थीं 

अविनय – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

ढाल पसीना जिसे बड़े प्यारों से पाला। जिसके तन में सींच सींच जीवन-रस डाला। सुअंकुरित अवलोक जिसे फूला न समाया। पा करके पल्लवित जिसे पुलकित हो आया। वह पौधा यदि न सुफल फले तो कदापि न कुफल फले। अवलोक निराशा का बदन नीर न आँखों से ढले।

वर्षा – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

नभ के नीले आँगन में घनघोर घटा घिर आयी! इस मर्त्य-लोक को देने जीवन-सन्देशा लायी॥1॥